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जैन संकट मोचन विनती Sankat mochan vinti

भक्‍तामर स्‍तोत्र

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जैन संकट मोचन विनती Sankat mochan vinti

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भक्‍तामर स्‍तोत्र
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कविश्री वृन्दावनदास हे दीनबंधु श्रीपति करुणानिधानजी | यह मेरी विथा क्यों न हरो बेर क्या लगी || मालिक हो दो जहान के जिनराज आपही | एबो-हुनर हमारा कुछ तुमसे छिपा नहीं || बेजान में गुनाह मुझसे बन गया सही | ककरी के चोर को कटार मारिये नहीं || हे दीनबंधु श्रीपति करुणानिधानजी | यह मेरी विथा क्यों न हरो बेर क्या लगी ||१||