तुम्हारी इच्छाएँ… सच में तुम्हारी हैं? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2024)
शास्त्रज्ञान
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तुम्हारी इच्छाएँ… सच में तुम्हारी हैं? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2024)
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वीडियो जानकारी: 13.06.2024, गीता समागम, ग्रेटर नोएडा
Title : तुम्हारी इच्छाएँ… सच में तुम्हारी हैं? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2024)
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विवरण:
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ।।
~भगवद् गीता (4.30)
अन्य लोग नियत-भोजन-सेवी होकर प्राणों को प्राणों में हवन करते है। ये सब यज्ञ के विद्वान यज्ञों के द्वारा निष्पाप होते हैं।
काव्य
विशेष स्वयं को मानकर
जड़-चेतन को भिन्न किया
न मैं विशेष न मेरी कामना
एकत्व उठा मैं मुक्त हुआ
~भगवद् गीता (4.30)
इस वीडियो में आचार्य जी भगवद् गीता के अध्याय 4 के श्लोक 30 पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह खुद को एक अलग, विशेष और कर्ता मानता है। वास्तव में जो कुछ भी हो रहा है, वह प्रकृति की एक विशाल प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें कोई व्यक्तिगत कर्ता नहीं होता। “मैं” की भावना केवल एक मानसिक निर्माण है, जो हर अनुभव को निजी और विशेष बना देती है। कामनाएं इस भ्रम को और मजबूत करती हैं, जिससे व्यक्ति बार-बार दुख में फँसता है। मुक्ति का मार्ग यह है कि जीवन को इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि नियति यानी सत्य की दिशा में जिया जाए। जब व्यक्ति देखता है कि कुछ भी उसका व्यक्तिगत नहीं है, तब अहंकार ढीला पड़ता है और वास्तविक स्वतंत्रता संभव होती है।
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संगीत: मिलिंद दाते
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