धरती धन न अपना: जिस किसान के पास अपनी धरती भी नहीं! | जगदीश चंद्र का कालजयी ग्रंथ
KATHAMRIT
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धरती धन न अपना: जिस किसान के पास अपनी धरती भी नहीं! | जगदीश चंद्र का कालजयी ग्रंथ
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धरती धन न अपना: जिस किसान के पास अपनी धरती भी नहीं! | जगदीश चंद्र का कालजयी ग्रंथ
जिसके हाथों से धरती पर अन्न उगता है... अगर उसी के पास अपनी एक मुट्ठी जमीन भी न हो, तो आखिर उसका अपना क्या है?
हिंदी के कालजयी उपन्यासों की कथा-सार श्रृंखला की कड़ी 66 में प्रस्तुत है जगदीश चंद्र का महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास ‘धरती धन न अपना’।
1972 में प्रकाशित यह उपन्यास पंजाब के ग्रामीण समाज में दलित जीवन, भूमिहीनता, जातिगत भेदभाव, आर्थिक शोषण और सामंती सत्ता की कठोर वास्तविकताओं को सामने लाता है। कथा का केंद्र चमार समुदाय है—वे मेहनतकश लोग जिनका श्रम गाँव की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है, लेकिन जिनके पास न अपनी जमीन है, न पर्याप्त धन और न ही बराबरी का सामाजिक सम्मान।
जगदीश चंद्र का यथार्थ किसी आदर्श गाँव की तस्वीर नहीं बनाता। खेतों की हरियाली के पीछे छिपी गरीबी, बेगार, कर्ज़, सामाजिक दूरी और अपमान को वे बेहद मार्मिक ढंग से सामने लाते हैं।
लेकिन यह केवल पीड़ा की कथा नहीं। इसके भीतर आत्मसम्मान, प्रतिरोध और बेहतर जीवन की आकांक्षा भी है।
‘धरती धन न अपना’ हमें आज भी यह सोचने पर विवश करता है—जिस धरती पर सबका जीवन टिका है, क्या उस पर सबका बराबर अधिकार है?
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