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चंचल मन ये जीता जिसने..... । कवि अमन अक्षर।

Mr Indian Trekker

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चंचल मन ये जीता जिसने..... । कवि अमन अक्षर।

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कवि अमन अक्षर रचित प्रेमरस की अनुपम कविता चंचल मन ये जीता जिसने , तुम में ऐसा कोई है । एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥ बस्ती बस्ती गीत लिए हम , अपनी बातें कहते हैं । कुछ गीतों की नईया ले हम , अपनी नदियाँ गहते हैं ॥ मन जब तुमसा होकर अक्सर , हमसे झगड़ा करता है । तब लगता है मन भीतर सब , लोग तुम्हारे रहते हैं ॥ अपनी होनी अनहोनी भी , एक ही साँस पिरोई है । एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥ भावुकता का सूरज निस दिन , चढ़ता और उतरता है । याद का चन्दा नियमित आकर , ठण्डी आँहें भरता है ॥ जीवन तुम तक सीमित होकर , पूरी दुनिया जैसा है । तुमसे बाहर आकर अपनी , छाया से भी डरता है ॥ प्यार की दुनिया में ही हमने , अपनी दुनिया बोई है । एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥ किसी कल्पना लोक में बीते , वो जीवन ही अच्छा है । इन तर्कों वाली दुनिया से , प्रेमी मन ही अच्छा है ॥ आस का हर पत्ता आखिर जब , उस डाली से टूट गया । यूँ लगता है प्रीतम अपना ,  खालीपन ही अच्छा है ॥ मन बैठी इक लड़की अक्सर , ऐसा सुन कर रोइ है । एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥