#024 | Chapter 14 “श्रीकृष्ण – लीला पुरुषोत्तम भगवान | दिव्य लीलाओं का अमृत | Book Reading
“Cheto Darpan Marjanam – 🙏@SNGM Banglore
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आज का सारांश - श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम भगवान
1. भगवान श्री कृष्ण की दिव्य प्रकृति और ब्रह्मा जी की स्तुति
जो लोग भगवान श्री कृष्ण को एक सामान्य मनुष्य जैसा भौतिक शरीर प्राप्त हुआ मानते हैं, उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता में आसुरी तथा अल्पज्ञ कहा गया है.
भगवान श्री कृष्ण सदैव दिव्य हैं और वे अपने भक्तों की श्रद्धा तथा उनका दिव्य आनंद बढ़ाने के लिए ग्वालबाल का शरीर धारण करते हैं.
ब्रह्मा जी ने भगवान श्री कृष्ण की स्तुति करते हुए स्वीकार किया कि वे समस्त सृष्टि के परमेश्वर हैं, प्रत्येक प्राणी के हृदय में परमात्मा रूप में रहकर सब कुछ जानते हैं और वे ही समस्त आकर्षणों के केंद्र हैं.
2. ब्रह्मा जी की मोह-लीला और श्री कृष्ण की अद्भुत शक्ति
ब्रह्मा जी द्वारा बछड़ों और ग्वालबालों को चुराए जाने के पश्चात भी, भगवान श्री कृष्ण ने अपने विस्तार द्वारा सबका रूप ले लिया था और किसी को भी एक वर्ष तक इसका आभास नहीं हुआ.
जब एक वर्ष पश्चात ब्रह्मा जी अपनी भूल समझकर वापस आए और उन्होंने देखा, तो वृंदावन के सभी बालकों और गायों को श्री कृष्ण के प्रति अत्यधिक और अलौकिक प्रेम उमड़ता हुआ दिखाई दिया.
श्री कृष्ण की विभिन्न शक्तियों के प्रभाव से सभी जीवों का संचालन होता है और वे अपनी विस्मृति तथा स्मृति के अनुसार कार्य करते हैं.
3. जीवों की स्वाभाविक प्रवृत्ति और आत्म-प्रेम का रहस्य
प्रत्येक जीव मूलतः अपने प्रति अत्यधिक आसक्त होता है, और घर, परिवार, मित्र, समाज आदि की वस्तुएं जीव को प्रसन्न करने में केवल गौण हैं.
मनुष्य आत्मकेन्द्रित होता है और शरीर तथा आत्म के प्रति वह अपनी पत्नी, संतान और मित्रों की अपेक्षा अधिक अनुरक्त रहता है तथा संकट आने पर सबसे पहले अपनी (आत्म की) रक्षा करता है.
इस शरीर के प्रति आसक्ति का एकमात्र कारण इसके भीतर स्थित "मैं" अर्थात आत्मा है, और जब मनुष्य और ऊपर उठ जाता है, तो वह समझता है कि आत्मा प्रिय है क्योंकि यह श्री कृष्ण का अंश है.
4. कृष्णभावनामृत (भक्ति) और उसकी महिमा
जो व्यक्ति श्री कृष्ण की भक्ति में लगा हुआ है, वह पहले से ही ब्रह्मभूत पद पर स्थित होता है और श्री कृष्ण का नाम ही पवित्रता तथा मुक्ति का सूचक है.
श्री कृष्ण के चरणार्विंद की शरण में आने वाला व्यक्ति अज्ञान सागर पार करने के लिए नाव में चढ़ जाता है और उसके लिए इस जगत का महान विस्तार गोखुर में जल जैसा नगण्य बन जाता है.
श्री शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को भगवान श्री कृष्ण के बालकाल, ग्वालबालों के साथ क्रीड़ा, कड़ेवा करने तथा ब्रह्मा द्वारा उनकी स्तुति का संपूर्ण वर्णन सुनाया, जिसे सुनने या पढ़ने से समस्त आध्यात्मिक इच्छाएं पूरी होती हैं.
हरे कृष्ण 🙏