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उपनिषदीय नैतिक दर्शन एवं कर्म सिद्धांत I SOVAC-01 | Indian Tradition & Values

Dr. Amit Wadaskar

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उपनिषदीय नैतिक दर्शन एवं कर्म सिद्धांत I SOVAC-01 | Indian Tradition & Values

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SOVAC-01: भारतीय परंपरा एवं मूल्य (Indian Tradition and Values) इकाई - I: भारतीय मूल्यों के ऐतिहासिक आधार, आश्रम एवं पुरुषार्थ व्याख्यान 03: उपनिषदीय नैतिक दर्शन एवं कर्म सिद्धांत (Upanishadic Moral Philosophy & The Sociological Doctrine of Karma) राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के अंतर्गत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUGP) के विद्यार्थियों हेतु समाजशास्त्र अध्ययनशाला द्वारा संचालित वैल्यू एडेड कोर्स (Value Added Course - SOVAC-01) का प्रथम व्याख्यान। 👨‍🏫 व्याख्याता (Course Facilitator & Resource Person): Dr. Amit Kumar Wadaskar MSW, M.A. (Sociology), NET/JRF, Ph.D. 🔗 मुझसे जुड़ें (Connect with me): Instagram: @amit_kumar_wadaskar Academia: Dr. Amit Wadaskar (https://ggu-in.academia.edu/DrAmitWad...) इस व्याख्यान में बाह्य कर्मकांड से आंतरिक आत्म-चिंतन की ओर उपनिषदीय प्रस्थान, सत्य, अहिंसा, दम, दया व तप के नैतिक स्तंभ, कार्य-कारण के वैज्ञानिक नियम के रूप में कर्म सिद्धांत, संचित, प्रारब्ध व क्रियमाण कर्म, आंतरिक सामाजिक नियंत्रण, पुनर्जन्म एवं सामाजिक स्तरीकरण, निष्काम कर्म योग तथा 21वीं सदी के पर्यावरण और व्यावसायिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। समाजशास्त्र अध्ययनशाला (Department of Sociology) 📌 व्याख्यान के मुख्य बिंदु (Key Highlights of Lecture 03): उपनिषदीय नैतिक क्रांति: बाह्य यज्ञीय कर्मकांडों से आंतरिक शुद्धि एवं सदाचार की ओर संक्रमण। आत्मन् और ब्रह्म की एकात्मता: सभी जीवों में एक ही चैतन्य आत्मा का वास एवं सामाजिक समता की दार्शनिक आधारशिला। उपनिषदों के नैतिक स्तंभ: सत्यमेव जयते (मुण्डकोपनिषद्), अहिंसा, दम, दान, दया (बृहदारण्यकोपनिषद्) एवं तप। कर्म सिद्धांत (कार्य-कारण संबंध): क्रिया-प्रतिक्रिया का सार्वभौमिक नैतिक नियम एवं व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Moral Accountability)। कर्म के तीन रूप: संचित (Sanchita), प्रारब्ध (Prarabdha) एवं क्रियमाण (Kriyamana) कर्म। आंतरिक स्वनियमन एवं सामाजिक व्यवस्था: पी.एच. प्रभु (Hindu Social Organization) के अनुसार आंतरिक सामाजिक नियंत्रण, सामाजिक ईर्ष्या-मुक्ति एवं आशावाद (Agency)। पुनर्जन्म एवं सामाजिक स्तरीकरण: सी.एन. शंकर राव के अनुसार जीवात्मा की नैतिक यात्रा, असमानता की दार्शनिक व्याख्या एवं रूढ़िवादी विकृतियों की समाजशास्त्रीय समालोचना। निष्काम कर्म योग: सकाम बनाम निष्काम कर्म, लोकसंग्रह, कॉर्पोरेट तनाव-प्रबंधन एवं व्यावसायिक नैतिकता (Professional Ethics)। समकालीन प्रासंगिकता: पारिस्थितिक ऋण (Environmental Karma), सतत जीवनशैली (अपरिग्रह), सहानुभूति से समानुभूति (Empathy) एवं सामाजिक समरसता। व्याख्यान सारांश, कक्षा चिंतन प्रश्न एवं आगामी व्याख्यान (Lec-03: त्रि-ऋण व्यवस्था) 📚 प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ (Reference Books): पी.एच. प्रभु (1954): Hindu Social Organization: A Study in Socio-Psychological and Ideological Foundations, पॉपुलर प्रकाशन, बॉम्बे। सी.एन. शंकर राव (2013): Sociology of Indian Society, एस. चांद एंड कंपनी, नई दिल्ली। श्रीमद्भगवद्गीता (कर्मयोग दर्शन)। ई-पीजी पाठशाला (e-PG Pathshala / UGC) एवं स्वयं प्रभा (Swayamprabha)। 💬 कक्षा विमर्श प्रश्न (Discussion Question for Students):"क्या कर्म सिद्धांत व्यक्ति को भाग्यवादी (Fatalist) बनाता है या अधिक कर्मठ व उत्तरदायी? आधुनिक व्यावसायिक कार्य संस्कृति में 'निष्काम कर्म' का सिद्धांत तनाव कम करने में कैसे सहायक है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें।" 🏷️ हैशटैग्स (Hashtags):#SOVAC01 #DoctrineOfKarma #UpanishadicPhilosophy #NishkamaKarma #IndianTraditionAndValues #SociologyLecture #NEP2020 #FYUGP #DrAmitKumarWadaskar #KarmaTheory #ProfessionalEthics #ValueAddedCourse