पुरानी कैसेट: Sir Syed Day 2010 | Mushaira ज़किया ग़ज़ल - बिसाते-जीस्त पे तन्हा खड़ी हूं
MUSHAIRA GOMTI AGENCIES
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पुरानी कैसेट: Sir Syed Day 2010 | Mushaira ज़किया ग़ज़ल - बिसाते-जीस्त पे तन्हा खड़ी हूं
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पुरानी कैसेट सीरीज़ की एक और बेहद असरदार रिकॉर्डिंग (Part 2) — Annual Sir Syed Day Mushaira 2010 (USA), जो Aligarh Alumni Association, Washington DC ने आयोजित किया था। इस मुशायरे में कराची से आईं शायरा ज़किया ग़ज़ल (Zakiya Ghazal) ने अपनी दो ग़ज़लों और कुछ बेहद खूबसूरत दोहों से पूरी महफ़िल को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उनकी पहली ग़ज़ल का वो मतला, जिसने महफ़िल का दिल जीत लिया:
बिसाते-जीस्त पे तन्हा खड़ी हूं,
मगर जीने से पहले मर गई हूं।
मेरा दुश्मन नहीं कोई यहां पर,
मुनाफ़िक़ दोस्तों में घिर गई हूं।
और उनकी तरन्नुम वाली ग़ज़ल का एक असरदार शेर, जिस पर पूरी महफ़िल ने साथ गुनगुनाया:
बेहुनर तो दूसरों के ऐब गिनकर शाद है,
कह के दूजे को ज़मीं, क्या आसमां हो जाएगा।
जब ज़बां खोलेंगे हम तो बेज़बां हो जाएगा।
आखिर में उन्होंने कुछ बेहद प्यारे दोहे भी सुनाए:
पहले प्यार की साजन, पहली थी बरसात,
ओढ़ के रखी याद तेरी, और जाग के काटी रात।
अगर आपको पुराने ज़माने के असली Mushaira, Urdu Shayari और Najm पसंद हैं, तो ये वीडियो पूरा ज़रूर देखिए। पुरानी कैसेट की तरह, ये शायरी आज भी उतनी ही खास है।
CD'S AVAILABLE AT:-
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OPP STATE BANK, AMINABAD, LUCKNOW U.P
PH 9839128165, 9335918233
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