Sri Caitanya Anthem | Sri Gaura Chalisa | Sujil Karmacharya | Spiritual Seasons
Spiritual Seasons
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Sri Caitanya Anthem | Gaura Purnima Lord Caitanya Mahaprabhu | Sujil Karmacharya | Spiritual Seasons | Sri Caitanya Mayapur Anthem
Sri Gaura Chalisa
Hare Krishna,
We would like to offer our humble obeisances unto the lotus feet of HH Mahavishnu Swami Maharaj, HG Patri Das, and all the devotees of the Lord.
We are always grateful to ISKCON, Nepal, and all the viewers for their valuable supports and blessings.
Please forgive us for any mistakes committed due to our ignorance.
Written by Sadhu Santanu Das
Music by The Seasons Band
Vocals by Sujil Karmacharya
Presentation of Stereo Records
श्री गौर चालीसा
दोहा
श्री गुरु गौरहरि चरण शरण ।
श्रीमन् गौराङ्ग संकिर्तन यज्ञवाहनः ।।
द्वापर युग कृष्ण स्वयं धर्म स्थापन ।
चतुर्युग जीवधर्म गुण भिन्न भिन्न ।।
कलि अवतार श्री गौराङ्ग भगवान ।
कृष्ण स्वयं गौर भेष प्रचार संकिर्तन ।।
देवकी नन्दन रचि लीला वृन्दावन ।
राधा माधव एक तन प्रकाश समान ।।
चौपाई
जय सचि जगन्नाथ प्राण निमाइ ।
नवद्वीप लीला अद्भुत सुन्नलाई ।।
श्रीकृष्ण ज्ञान श्री चैतन्य व्यवहार ।
पालन स्वयं हरि भक्त अवतार ।।
श्री चैतन्य अवतरण फाल्गुण पूर्णिमा ।
काल त्यो हरि सन्ध्या ग्रहण चन्द्रमा ।।
गंगातट गुञ्जियो शुद्ध हरि धुन ।
श्रीधाम नवद्वीप भइ पुण्य धन्य ।।
जय जगन्नाथलाल सचि सन्तान ।
विश्वम्भर विख्यात श्री निमाइ विद्वान ।।
रोदन बन्द सुनि हरिनाम दंग ।
बाललीलाको खेल शेषनाग संग ।।
श्यामवर्ण कृष्ण चैतन्य स्वर्ण रुपमा ।
वृन्दावन नवद्वीप यी धाम अभिन्न ।।
कृष्णचन्द्र गौरचन्द्र पूर्ण पुरातन ।
कलिकाल शुभ सकुन गौर भजन ।।
बाललीला गौराङ्ग भाग्यवान ब्राह्मण ।
धन्य पाई दर्शन हरिभोग अर्पण ।।
नटखट निमाइ आनन्द घटि घटना ।
रुढीवादी अवज्ञा अवरोध उत्पन्न ।।
दिग्विजयी काश्मिरी विजेता पण्डित ।
बालक निमाइ सामु शरम अत्यन्त ।।
काजी सामु चैतन्य धरि उग्ररुप ।
हरि भजन नबाधक वचन स्वरुप ।।
श्रीनिवास घर आँगन चैतन्य चमत्कार ।
भरपेट आँप प्रसाद इच्छा अनुसार ।।
स्वयं लक्ष्मी विष्णुप्रिया चैतन्य सेविका ।
अनुशरण विश्वम्भर हुकुम सचिका ।।
गौर हरि धारण त्रिदण्डी सन्यास ।
माँ सचि आग्रह निलाचल निवास ।।
महाप्रभु प्रचार विस्तृत विस्तार ।
हरिप्रेम प्रसार भ्रमण निरन्तर ।।
अनेकादी गोस्वामी श्री चैतन्य शरण ।
भावावेश विश्वरुप षड्भुज धारण ।।
विशिष्ट दयाभाव पवित्र जग आकाश ।
व्रजभूमि गौर आज्ञा पुनः प्रकाश ।।
द्वेषरहित मैत्रीपूर्ण बाघ हरिण ।
झारखण्ड लीला श्री गौराङ्ग संकिर्तन ।।
सत्ययुग ध्यान त्रेतायुग यज्ञ दान ।
द्वापर अर्चनाविधि कलि संकिर्तन ।।
श्रीकृष्ण रुप अनेकादी असुरवध ।
श्री गौरहरि आसुरी प्रवृत्ति सखाप ।।
उदाहरण जगाई(मधाई ती दुई चोर ।
दयालु स्वभाव गौर प्रेम अवतार ।।
द्विभुजी कृष्णरुप चतुर्भुजी नारायण ।
एक साथ दर्शन पाइ सार्वभौम परायण ।।
चैतन्य दर्शन हेतु पुरी जनक आतुर ।
राजन विनम्र स्थिर महाप्रभु स्वीकार ।।
रामानन्द प्रेमाभक्ति भगवान पहिचान ।
प्रकाशानन्द स्वीकार कृष्णनाम भजन ।।
शून्य निराकार श्री चैतन्य मत विरोध ।
ब्रह्मज्योति साधना हरिप्रेम अवरोध ।।
साकार रुपि शुद्ध कृष्णभावना प्रयास ।
हरिप्रेम सर्वोच्च सफल योग अभ्यास ।।
जीवधर्म शरणागत हरिप्रेम बहन ।
संकिर्तन माध्यम स्वःस्फुर्त ज्ञान ।।
अचल विश्वास स्पष्ट महाज्ञान ।
तनमय चिन्तन श्री चैतन्य कथन ।।
भगवतप्रेम समान न योग आसन ।
गौर निर्देश कृष्णनाम भर जीवन ।।
मायावादी शून्यवादी कृष्णप्रेम जागृत ।
पठान वैष्णव श्री गौराङ्ग समाहित ।।
धर्म वर्ण लिङ्ग जाती मतभेद उपर ।
हरिनाम श्री हरिकै शब्द अवतार ।।
भ्रमण रमण आलिङ्गन अति आनन्द ।
बृजवासी गाइपंक्षी सब परमानन्द ।।
बृक्षपात संग पुरानो नाता संबन्ध ।
गौर हरि प्रदर्शन गोपी प्रेम विशुद्ध ।।
श्री पञ्चतत्व प्रभुका अति निकट पार्षद ।
षड्गोस्वामी उपदेशित भक्ति सिद्धान्त ।।
प्राणधार श्रीकृष्ण ज्ञान पाई सौभाग्य ।
फलस्वरुप फक्रिएको भक्ति सम्प्रदाय ।।
अन्त्यलीला थामिनसक्नु अनेक रेखारुप ।
मुर्छित रस माधुर्य स्वतः हरिमै अलप ।।
श्री गौर हरिलीला अपार सागर विस्तार ।
एक बुँद आनन्द अपार मस्त पिकर ।।
श्री गौर चालीसा प्रभाव कृष्णप्रेम पूर्ण ।
पाठ गरे बारम्बार गौरलीला गुण ।।
लुप्तप्रेम प्रकाश श्री नाम रुचि जीवन ।
मनचित्त रुपि दर्पण निर्मल कञ्चन ।।
हरि बोल हरि बोल हरि बोल हरि बोल
हरि बोल हरि बोल हरि बोल हरि बोल
दोहा
वन्दे श्रीकृष्ण चैतन्य श्री राधाकृष्ण युगल रुप ।
अपार करुणा सिन्धु नमो भक्तमन्दार विग्रहः ।।
श्री गौरवर्ण गौराङ्ग नित्य श्री नित्य मङ्गल ।
श्री राधाभाव राधाप्राण किर्तनिय विग्रहः ।।