CGMH7| कल्चुरी कालीन प्रशासनिक व्यवस्था | Administrative system of Kalchuri | CG Medieval History
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CGMH7| कल्चुरी कालीन प्रशासनिक व्यवस्था | Administrative system of Kalchuri | CG Medieval History
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कलचुरी शासकों में छत्तीसगढ़ में 1000 ई. से 1741 ई. तक सर्वाधिक लम्बी अवधि तक शासन किया | आरम्भ में छत्तीसगढ़ में जो कलचुरी कालीन शासन व्यवस्था स्थापित हुई थी, वह कलचुरी वंश की मुख्य शाखा की शासन व्यवस्था के अनुरूप थी किन्तु कालांतर में जाजल्लदेव प्रथम के द्वारा त्रिपुरी से अपनें राज्य की स्वतंत्रता घोषित करनें के बाद यहाँ के शासकों नें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार शासन व्यवस्था विकसित की |16 वीं शताब्दी में कल्याण साय द्वारा लिखी गयी राजस्व पुस्तिका में कलचुरी कालीन प्रशसनिक एवं राजस्व व्यवस्था की पर्याप्त जानकारी मिलती है |
प्रशासन
कलचुरी कालीन शासन व्यवस्था एक सुद्रिण केंद्रीकृत शासन व्यवस्था थी | जिसमें राजा प्रमुख था तथा वह अपनी सहायता के लिए मंत्री, अधिकारीगण तथा अन्य प्रशासनिक पदों पर स्थानीय लोगों की नियुक्ति करता था जो स्थानीय परम्पराओं और भावनाओं से जुड़े हुए थे |
कल्चुरिओं नें प्रशासन की सुविधा के लिए कई प्रशासनिक इकाइयों का गठन किया हुआ था |जो की निम्नलिखित हैं –
राष्ट्र (संभाग ) होता था जिसका अधिपति राजा होता था |
विषय (जिला) होता था जिसका अधिपति विषयपति होता था |
देश या जनपद (तहसील) होता था जिसका अधिपति महामंडलेश्वर होता था |
मंडल (वर्तमान खंड जैसा ) होता था जिसका अधिपति मांडलिक होता था |
सम्पूर्ण राज्य प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से गढ़ों में विभाजित था, गढ़ बरहों में तथा बरहों ग्राम में विभाजित था | शासन की न्यूनतम इकाई ग्राम थी | प्रत्येक अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्रा पूर्वक कार्य करते थे |विषय का उल्लेख रत्नदेव द्वितीय के शिवरी नारायण ताम्रपत्र में किया गया है |देश का उल्लेख पृथ्वीदेव द्वितीय के शिलालेख में – मध्यप्रदेश, वडहर, भट्टविल, भ्रमरवद्र, काक्र्य, तमनाल, विट्टारादेश किया गया है |मंडल का उल्लेख विभिन्न कलचुरी अभिलेखों में किया गया है | मंडल जैसे अपर मंडल, एवंडी मंडल, कोमो मंडल, जैपुर मंडल, तलहरी मंडल, सामंत मंडल, मध्य मंडल आदि |
मंत्रीमंडल
मंत्री परिषद् को अमात्य मंडल कहा जाता था | राजा के मंत्री मंडल के अन्तरगत निम्नलिखित मंत्रीगण शामिल थे –
युवराज – राजा का पुत्र
महामंत्री – राजा का प्रशासनिक सलाहकार
महामात्य – सचिवालय प्रमुख मंत्री
महासंधि विग्रहक – विदेस मंत्री
महापुरोहित – राजगुरु, धार्मिक विभाग का प्रमुख
महाप्रतिहार – संचार विभाग का प्रमुख, राजा का अंग रक्षक, सदैव राजा के पास रहता था
महाप्रमातृ – जमाबंदी विभाग का प्रमुख, भूमि की माप कर लगान निश्चित करनें वाला, राजस्व मंत्री
कर एकत्रित करनें वाला अधिकारी – शौल्किक
यातायात अधिकारी – गमागमिक
नगर का प्रमुख अधिकारी – पुरप्रधान
ग्राम प्रमुख अधिकारी – ग्रामकूट
राजा के अधिकारीगण
राजा के अधिकारी गण के अंतर्गत विभिन्न विभागों के प्रमुख आते थे –
सचिवालय का प्रमुख अधिकारी – महाध्यक्ष
सैन्य प्रशासन का अधिकारी – महासेनापति
सर्वोच्च पुलिस अधिकारी – दंडपाशिक
किले की रक्षा करनें वाला अधिकारी – महाकोट्टपाल
न्यायाधिकारी एवं पुलिस प्रबंध अधिकारी
न्यायिक अधिकारी का मुख्या दांडिक होता था |कानून व्यवस्था का अधिकारी भट्ठ होता था | चोर पकडनें वाला अधिकारी – दुष्ट साधक कहलाता था |संपत्ति की रक्षा के लिए पुलिस तथा नगरों में सैनिक नियुक्त होते थे किन्तु दान दिए गए गाँव में इनका प्रवेश वर्जित था |
धर्म विभाग
दान पत्रों का लेखा जोखा एवं हिसाब रखने वाला अधिकारी को धर्मलेखी कहा जाता था |
युध्द एवं प्रतिरक्षा प्रबंध –
युद्ध एवं प्रतिरक्षा प्रबंध के लिए हांथी, घोड़े, पैदल, सेना, रथ, चतुरंगी (पैदल, हांथी, घोंडा, और रथ की सामूहिक सेना ) सेना का प्रबंध किया गया था |
स्थानीय प्रशासन
स्थानीय कार्यों के प्रशासन हेतु नगरों एवं गाँव में पंचकुल नामक संस्था होती थी |पंचकुल में 5 सदस्य होते थे, किन्तु कहीं-कहीं 10 भी होते थे | पंचकुल के सदस्य को महत्तर तथा इसके मुख्या (प्रमुख) को महत्तम कहते थे |इनके सदस्यों का चुनाव गाँव की जनता द्वारा किया जाता था |पंचकुल गाँव, जमीन का कर वसूली व न्याय करनें आदि का कार्य करते थे |पंचकुल के निर्णय के विरुध्द अपील सुनने का अधिकार राजा को था |
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