विष्णु पुराण | आठवा अध्याय | सम्पूर्ण कथा हिंदी में | Vishnu Puran | Part-8 |
ved amrit gatha
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विष्णु पुराण | आठवा अध्याय | सम्पूर्ण कथा हिंदी में | Vishnu Puran | Part-8 |
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ved amrit gatha
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@vedamritgatha
vishnu puran part-8 | विष्णु पुराण | आठवा अध्याय | hindi |
श्रीविष्णुपुराण
प्रथम अंश
आठवाँ अध्याय
रौद्र-सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन
श्रीपराशरजी बोले- हे महामुने ! मैंने तुमसे ब्रह्माजीके तामस-सर्गका वर्णन किया, अब मैं रुद्र-सर्गका वर्णन करता हूँ, सो सुनो कल्पके आदिमें अपने समान पुत्र उत्पन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहित वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ
हे द्विजोत्तम ! जन्मके अनन्तर ही वह जोर-जोरसे रोने और इधर-उधर दौड़ने लगा। उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे पूछा- "तू क्यों रोता है?" उसने कहा- "मेरा नाम रखो।" तब ब्रह्माजी बोले-'हे देव! तेरा नाम रुद्र है, अब तू मत रो, धैर्य धारण कर।' ऐसा कहनेपर भी वह सात बार और रोया
तब भगवान् ब्रह्माजीने उसके सात नाम और रखे; तथा उन आठोंके स्थान, स्त्री और पुत्र भी निश्चित किये हे द्विज ! प्रजापतिने उसे भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र और महादेव कहकर सम्बोधन किया यही उसके नाम रखे और इनके स्थान भी निश्चित किये। सूर्य, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश, [यज्ञमें] दीक्षित ब्राह्मण और चन्द्रमा-ये क्रमशः उनकी मूर्तियाँ हैं हे द्विजश्रेष्ठ ! रुद्र आदि नामोंके साथ उन सूर्य आदि मूर्तियोंकी क्रमशः सुवर्चला, ऊषा, विकेशी, अपरा, शिवा, स्वाहा, दिशा, दीक्षा और रोहिणी नामकी पत्नियाँ हैं। हे महाभाग ! अब उनके पुत्रोंके नाम सुनो; उन्हींके पुत्र-पौत्रादिकोंसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है शनैश्चर, शुक्र, लोहितांग, मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान और बुध-ये क्रमशः उनके पुत्र हैं ऐसे भगवान् रुद्रने प्रजापति दक्षकी अनिन्दिता पुत्री सतीको अपनी भार्यारूपसे ग्रहण किया हे द्विजसत्तम ! उस सतीने दक्षपर कुपित होनेके कारण अपना शरीर त्याग दिया था। फिर वह मेनाके गर्भसे हिमाचलकी पुत्री (उमा) हुई। भगवान् शंकरने उस अनन्यपरायणा उमासे फिर भी विवाह किया भृगुके द्वारा ख्यातिने धाता और विधातानामक दो देवताओंको तथा लक्ष्मीजीको जन्म दिया जो भगवान् विष्णुकी पत्नी हुई
श्रीमैत्रेयजी बोले- भगवन् ! सुना जाता है कि लक्ष्मीजी तो अमृत-मन्थनके समय क्षीर सागरसे उत्पन्न हुई थीं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि वे भृगुके द्वारा ख्यातिसे उत्पन्न हुईं
श्रीपराशरजी बोले- हे द्विजोत्तम ! भगवान्का कभी संग न छोड़नेवाली जगज्जननी लक्ष्मीजी तो नित्य ही हैं और जिस प्रकार श्रीविष्णुभगवान् सर्वव्यापक हैं वैसे ही ये भी हैं विष्णु अर्थ हैं और ये वाणी हैं, हरि नियम हैं और ये नीति हैं, भगवान् विष्णु बोध हैं और ये बुद्धि हैं तथा वे धर्म हैं और ये सत्क्रिया है हे मैत्रेय ! भगवान् जगत्के स्रष्टा हैं और लक्ष्मीजी सृष्टि हैं, श्रीहरि भूधर (पर्वत अथवा राजा) हैं और लक्ष्मीजी भूमि हैं तथा भगवान् सन्तोष हैं और लक्ष्मीजी नित्य-तुष्टि हैं भगवान् काम हैं और लक्ष्मीजी इच्छा हैं, वे यज्ञ हैं और ये दक्षिणा हैं, श्रीजनार्दन पुरोडाश हैं और देवी लक्ष्मीजी आज्याहुति (घृतकी आहुति) हैं
हे मुने ! मधुसूदन यजमानगृह हैं और लक्ष्मीजी
पत्नीशाला हैं, श्रीहरि यूप हैं और लक्ष्मीजी चिति हैं
तथा भगवान् कुशा हैं और लक्ष्मीजी इध्मा हैं
भगवान् सामस्वरूप हैं और श्रीकमलादेवी उद्गीति हैं,
जगत्पति भगवान् वासुदेव हुताशन हैं और लक्ष्मीजी
स्वाहा हैं हे द्विजोत्तम ! भगवान् विष्णु शंकर हैं
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