"शब्दों की सरिता", व्लोग-551, कवि-"मुरली" (धनजीभाई गढीया) पार्श्व संगीत-धनजीभाई गढीया"मुरली"
Shabdo ni Sarita (શબ્દો ની સરિતા) शब्दों की सरिता
0:00 / 0:00
"शब्दों की सरिता", व्लोग-551, कवि-"मुरली" (धनजीभाई गढीया) पार्श्व संगीत-धनजीभाई गढीया"मुरली"
14 просмотров · 10 дн. назад
Shabdo ni Sarita (શબ્દો ની સરિતા) शब्दों की सरिता
152 подписчика
14 просмотров · 10 дн. назад
काव्य रचना
=======
(1) मोह का बंधन
===========
मोह के बंधन में हर मोड़ पर भरमाता रहा,
सत्य का सूरज मेरे भ्रम को चमकाता रहा।
लाभ-हानि की डगर में आज में खो गया हूंँ,
जीवन में लालच के लिए मै दौड़ता ही रहा।
आसक्ति की जंजीर को कभी न छोड़ पाया,
आज खुद को मै खुद में हरपल खोजता रहा।
मतलबी स्वार्थ के मेले में आज फंँस गया हूंँ,
त्याग के उज़ाले को मै हर जगह ढुंढता रहा।
मोह के बंधन में कभी मुकम्मल जहाँ न मिला,
मानवता का पथ मुझसे सदा दूर भागता रहा।
'मुरली' अब तोड़ना चाहता हूंँ मै मोह-ज़ाल को,
खुदा की कयामत का सदा इंतज़ार करता रहा।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
(2) जय परिजय
=========
जीत का नशा भी कभी उतर जाता है,
हार का ज़ख्म भी कभी सँवर जाना है।
पराजय से कभी भी मायूस बनना नहीं,
कभी न कभी तो विजय मिलना ही है।
राह पर भले ही अनेक अवरोध आ जाए,
फिर भी मंज़िल तरफ आगे बढना ही है।
आज हार के कारण टूटकर बैठना नहीं,
कल जीतकर तुम्हें इतिहास बनाना है।
जय के नशे में कभी ख़ुद को भुलाना नहीं,
जीवन में समय कभी भी बदल जाता है।
बहुत कुछ सिखने मिलता है हमे हार से,
कठीन परिश्रम को दुनिया ने सराहा है।
जय और पराजय तो जीवन के दो पैये हैं,
'मुरली' हर हाल में उसका ख्याल रखना है।
रचना:- धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)