Hasid से Doori me Aafiyat | Lahsun wali Daawat Ka Raaz | Nek Shakhsh Aur Hasid Darbaari
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حکایت 142: بے ادبوں سے دوری میں عافیت
एक ऐसा हकीम जो बादशाहों की महफ़िल में जाकर हिकमत भरी बातें किया करता था। उसकी एक छोटी-सी नसीहत थी:
“محسن کے ساتھ احسان کرو، اور جو برائی کرے اُس کی برائی کا بدلہ اُسے خود ہی مل جائے گا۔”
लेकिन एक हसद करने वाला दरबारी उसकी शोहरत और बादशाह के क़रीब होने से जलने लगा। उसने हकीम के ख़िलाफ़ बादशाह के दिल में शक पैदा करने के लिए एक ऐसी चाल चली, जिसका अंजाम खुद उसी के लिए मुसीबत बन गया।
एक तरफ़ था हसद और बदनीयती का जाल, और दूसरी तरफ़ थी एक ऐसी सच्चाई जिसे बादशाह ने देर से समझा।
क्या दरबारी की चाल कामयाब होगी?
हकीम के हाथ पहुँचा हुआ मुहरबंद ख़त किसके लिए था?
और आख़िर क्यों वही शख़्स अपनी साज़िश का शिकार हो गया?
इस इब्रतनाक हिकायत से हमें हसद, बदनीयती, चुगली और दूसरों के लिए बुराई चाहने के अंजाम के बारे में एक गहरी सीख मिलती है।
सबक:
इंसान दूसरों के लिए जो बुराई चाहता है, कभी-कभी वही बुराई पलटकर उसके अपने सामने आ खड़ी होती है। इसलिए दिल को हसद से पाक रखना और दूसरों के साथ नेकी करना ही बेहतर रास्ता है।
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