डॉ राही मासूम रज़ा साहब का शताब्दी वर्ष --- Centenary Year of Dr Rahi Masoom Reza @BollywoodNewsnet
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1st September 2026
डॉ राही मासूम रज़ा साहब का शताब्दी वर्ष
The Centenary Year of Dr Rahi Masoom Reza Sahab
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दोस्तों... जय सिनेमा !
बॉलीवुड की बातों के साथ, मैं हूँ सय्यद आसिफ जाह…
अदब और सिनेमा के क्षितिज पर जब भी उस शख़्सियत का ज़िक्र होता है जिसने अपनी क़लम से इस मुल्क की रूह को छुआ, तो ज़ेहन में डॉ. राही मासूम रज़ा का नाम आता है। 15 मार्च 1992 को कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद जब उन्होंने आख़िरी साँस ली, तो हिन्दुस्तानी फ़िक्र-ओ-फ़न के एक दौर का इख़्तिताम हो गया। साल 2027 उनका सौवाँ साल (शताब्दी वर्ष) है, और नफ़रत के इस दौर में राही साहब को याद करना पहले से ज़्यादा ज़रूरी महसूस होता है।
राही मासूम रज़ा का जन्म 1 अगस्त 1927 को उत्तर प्रदेश के ज़िला गाज़ीपुर के छोटे से गाँव गंगौली में हुआ। वो ख़ुद को फ़ख़्र से “गंगापुत्र” कहा करते थे। यही गंगौली और इसके खेत-खलिहान बाद में उनके कालजयी उपन्यासों—‘आधा गाँव’, ‘नीम का पेड़’, ‘कटरा बी आर्ज़ू’ और ‘दिल एक सादा काग़ज़’ में ढलकर सामने आए।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उन्होंने पीएचडी की और उर्दू पढ़ाई। 1960 के दशक के आख़िर में अलीगढ़ की सुरक्षित नौकरी छोड़कर बीवी नैय्यर रज़ा और बच्चों के साथ बम्बई का रुख़ किया। उस दौर में संजीदा अदीब फ़िल्मों के लिए लिखने को “कमतर” काम समझते थे, मगर राही साहब का मानना था कि फ़िल्म-लेखन कोई घटिया मज़दूरी नहीं, बल्कि पूरा क्रिएटिव अमल है।
सत्तर और अस्सी के दशक में उन्होंने ‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’, ‘मिली’, ‘तवायफ़’, ‘गोलमाल’, ‘कर्ज़’, ‘जुदाई’, ‘लम्हे’ जैसी 300 से ज़्यादा फ़िल्मों के लिए मुक़ालमे और स्क्रिप्ट लिखीं। उन्हें तीन बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया। बम्बई की तन्हाई और जद्दोजहद पर उनके ये अशआर मशहूर हैं:
“हर गली हिज्र की एक गली, बम्बई शहर में;
दर्द के हैं कई रास्ते, बम्बई शहर में…”
“ज़हर मिलता रहा, ज़हर पीते रहे,
रोज़ मरते रहे, रोज़ जीते रहे…”
जब बी.आर. चोपड़ा ने धारावाहिक ‘महाभारत’ की पटकथा व संवाद के लिए राही साहब को चुना, तो कुछ तंग-नज़र हल्कों ने विरोध किया कि एक मुसलमान हिंदू ग्रंथ कैसे लिखेगा? चोपड़ा जी ने ख़तों के गट्ठर सामने रखे तो राही साहब मुस्कुराए और बोले:
“अब तो मैं ही ‘महाभारत’ लिखूँगा, क्योंकि मैं गंगा का पुत्र हूँ। मुझसे ज़्यादा भारत की तहज़ीब और तारीख़ को कौन जानता है?”
उन्होंने “पिताश्री”, “माताश्री”, “भ्राताश्री” जैसे अल्फ़ाज़ आम हिन्दुस्तानी ज़बान पर चढ़ा दिए। धारावाहिक की टीआरपी 80-86% तक पहुँच गई और करोड़ों दिलों ने उन्हें “आधुनिक वेदव्यास” स्वीकार किया। जब अटल बिहारी वाजपेयी ने कृष्ण के किरदार पर सवाल उठाया, तो राही साहब ने बेबाकी से पूछा था, “क्या आपने महाभारत पढ़ी है?”
विरोध के ख़तों पर वे कहते थे—“गालियों का छोटा गट्ठर मुझे हौसला देता है कि मुल्क में नफ़रत फैलाने वाले लोग प्यार करने वालों के मुक़ाबले बहुत कम हैं।”
राही साहब का असली तख़्लीकी क़िला उपन्यास और शायरी थी। ‘आधा गाँव’ में उन्होंने 1947 के विभाजन और साम्प्रदायिकता पर प्रहार करते हुए सवाल उठाया था कि अगर गंगौली में 'गंगौली वाले' कम और धार्मिक पहचानें ज़्यादा हो जाएँ, तो गाँव का क्या होगा?
‘टोपी शुक्ला’ का उनका मशहूर जुमला आज भी आईना दिखाता है:
“पैदा तो सिर्फ़ बच्चे होते हैं। मरते-मरते वो हिंदू, मुसलमान, ईसाई या हिन्दुस्तानी हो जाते हैं।”
उनकी बेबाक नज़्म की ये पंक्तियाँ गंगा-जमनी तहज़ीब का प्रतीक हैं:
“मेरा नाम मुसलमानों जैसा है, मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो,
लेकिन मेरी नस-नस में गंगा का पानी दौड़ रहा है…”
कैंसर की बीमारी के बावजूद उन्होंने अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी। 15 मार्च 1992 को मुंबई में उनका सफ़र ख़त्म हुआ और सांताक्रूज़ में सुपुर्द-ए-ख़ाक किए गए।
राही मासूम रज़ा सिर्फ़ एक लेखक नहीं, बल्कि इंसानियत का पैमाना थे। जैसा कि उन्होंने लिखा था:
“ज़ख्म जब भी कोई ज़ेहन-ओ-दिल पर लगा, ज़िंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला,
हम भी गोया किसी साज़ की तार हैं, चोट खाते रहे, गुनगुनाते रहे।”
अल्लाह राही मासूम रज़ा की रूह पर रहम करे और हमारी फ़िल्मों व अदब को उनकी तरह सच्चा और इंसान-दोस्त बनाए।
जय सिनेमा !
जय Bollywood …!
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