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काॅं हरैग्यो म्यर पहाड़ !Kaan Haraigyo Myar Pahaad! New Kumaoni song 2025! Uttarakhandi pahadi song!

Uttaranchal Series

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काॅं हरैग्यो म्यर पहाड़ !Kaan Haraigyo Myar Pahaad! New Kumaoni song 2025! Uttarakhandi pahadi song!

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काॅं हरैग्यो म्यर पहाड़ (Kaan Haraigyo Myar Pahaad) Singer : Naveen Pathak & Dilip Kumar Lyrics: Shri Anand Ballabh Papanai Music , Mix & Master : Saurya ( Skv Saab ) Flute : Jai Prakash Chaukhiyal Poster & Editing: Music DXR Studio Recording : Nanda Studio ( Haldwani) Producer : Harish Chandra Papanai Special Thanks to : , Rajesh Poonaji , Rajendra Khulbeji, Rakesh Kandpalji , Girish Bhattji, Deepak Khulbe & Jyoti Papnai #kumaonisong #newpaharisong #uttaranchal_series #myarpahaad_ #newkumaonisong2025 #naveenpathak_newsong #kaan_haraigyo_myar_pahaad #kan_haregyo_myar_pahad #myar_pahad All rights reserved with Uttaranchal Series. Please Subscribe our channel and hit the bell icon for new videos & updates from Uttaranchal Series "गीत के शब्द " को०:पहाड़ों में नानछिना,लागछी खेल बाटपना। पहाड़ै याद जब ऊंछी, गुदगुदै दी तनमना।। स्थाई : क्यैलै बुशीग्यो मेरो पहाड़ा, कां हरैग्यो मेरो पहाड़ा। टुटिया कुड़ी जामी रौ झाड़ा, धारनौल सूखा गाड़ गध्यारा । अ०१: गोरु ,भैंस बकरा सबै हराया, नमड़ु आलु जास मनखी रया । धो देखणा मनख्यों मुख, रै गई यां अब दु:खै -दु:ख ।। सिसौंण जामि रौ सारै कोख्याड़ा, क्यैलै बुशीग्यो...……...............। अ०२: नौल धारा बण गजारा , बुगिल फुलिरौ यां सारी -सारा। खनार हैगी अब बागूॅं ड्यरा, रात-दिन सुअरों फ्यारा। गुसैं हैगो अब गौं हबे टाड़ा, क्यैलै बुशीग्यो...............। अ०३: फुल्ध्यै छमध्यै और दैंणी द्वारा, अब नि सुणीनों यां वार-पारा । हरै गई अब होई होल्यारा, स्वैंणा देखण हैग्यी यां त्यार-बारा। गुणी बानरों भारी उज्याड़ा, क्यैलै बुशीग्यो...............। अ०४: कुड़ी -कुड़ीमा लागीरै ताई, ताइमा लागिरै बड़ुवै जाई । लाकुड़, ग्वेल,हरीज्यु धूणी, पाथर झड़िबे ऐगई मूणी। पितरौं कुड़िम पितरौं डाड़ा, क्यैलै बुशीग्यो...............। अ०५:क्वेतो करो भाई हमरि फामा, येति ल्याओ रुजगार कामा । तब्बै खुलला यों ढकी द्वारा, गौं बज्यैबे पै को जालौ भ्यारा। बाट आई दयप्ता निजालौ खाड़ा, क्यैलै बुशीग्यो...............। यह गीत पहाड़ से पलायन पर आधारित है। दशकों से पहाड़ से लोगों का शहरों की तरफ लगातार पलायन हो रहा है।अब गांवों में गिनती के कुछ ही लोग बचे हैं,और कुछ गांव तो लगभग खाली हो चुके हैं, सभी घरों में ताले लगे हैं, यहां तक ,कुछ घर खण्डहर हो चुके हैं, जिनमें जंगली जानवरों ने छिपने का स्थान बना लिया है। हमारे ईष्टदेव, देवी-देवताओं के मन्दिर (थान ) , जिनमें हम लोग हर शुभ अवसर पर धूप-बत्ती व पूजा -पाठ करते थे, जीर्ण -क्षीर्ण अवस्था में हैं, कुछ का तो पता भी नहीं लग पाता,कि कहाॅं हैं। खेत खलिहान बंजर पड़े हैं, कुछ लोग जो किसी तरह रह भी रहे हैं, जंगली जानवरों के आतंक से भयभीत रहते हैं। मेहनत कर कुछ खेती -बाड़ी करते हैं, लेकिन जंगली जानवर एक पल में सारा नष्ट कर जाते हैं। पलायन के कारण हमारे लोकपर्व एवं लोक-संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। इन सब परिस्थितियों का मुख्य कारण है, रोजगार का अभाव , जिस कारण ,पलायन पहाड़ के लोगों के लिये मजबूरी बन चुका है । उक्त गीत में इन्हीं सब समस्याओं को दर्शाने का प्रयास किया है। गीत के अंत में, सरकार से पहाड़ में रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिये निवेदन किया है। पहाड़ में रोजगार होगा तो ,आगे पलायन रूकेगा और जो लोग पहाड़ से पलायन कर शहरों में किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं, वे लोग भी अपने गांव की तरफ लौटेंगे, क्योंकि अधिकांश लोगों का मजबूरी में शारीरिक पलायन हुआ है, मानसिक नहीं। मन हमेशा पहाड़ से ही जुड़ा रहता है, ऐसी मेरी धारणा है। फलत: पहाड़ में फिर से रौनक व खुशहाली आयेगी, बशर्ते सरकार रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये।