“सबको खुश रखते-रखते, वह खुद को ही भूल गया | एक मनोवैज्ञानिक कहानी” | psychocart
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कभी दूसरों को खुश रखते-रखते इंसान खुद को ही भूल जाता है। यह कहानी आस्था की है, जिसने दूसरों की उम्मीदों के बीच अपनी पहचान खो दी थी। लेकिन एक दिन उसे एहसास हुआ कि दूसरों को समझना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी खुद को समझना भी है।
एक emotional psychological story जो रिश्तों, उम्मीदों, आत्मसम्मान और खुद को दोबारा पहचानने की यात्रा दिखाती है।
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