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उत्तराखंड के टम्टा, शिल्पकार जो तैयार करते हैं ताम्बे के बर्तन | Who are these People | Arjun k v

Arjun Khalptia

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उत्तराखंड के टम्टा, शिल्पकार जो तैयार करते हैं ताम्बे के बर्तन | Who are these People | Arjun k v

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Arjun Khalptia
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उत्तराखंड के टम्टा, शिल्पकार जो तैयार करते हैं ताम्बे के बर्तन | Who are these People | Arjun k v इस वीडियो को तैयार करने में अपना विशेष सहयोग दिया है 1- डॉ संजय कुमार टम्टा 2-प्रियंका प्रीत 2-सुन्दर लाल टम्टा ताम्रकार ,मनोज कुमार टम्टा ग्राम प्रधान खर्कटम्टा,अशोक टम्टा ताम्रकार जिला पर्यटन अधिकारी आगरा मुरादाबाद प्रदीप टम्टा some information खरेई क्षेत्र में टम्टा समाज: इतिहास, संस्कृति और सामाजिक पहचान की एक झलक उत्तराखंड की कुमाऊँ घाटी सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विविधताओं से भरपूर है। इसी विविधता में एक प्रमुख स्थान टम्टा समाज का है, जिनकी ऐतिहासिक उपस्थिति खासतौर पर बागेश्वर जिले के खरेई क्षेत्र में देखने को मिलती है। यह लेख इस समाज के खरेई क्षेत्र में बसने के कारण, उनके मूल, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक पिछड़ापन, विवाह पद्धति, और धार्मिक पृष्ठभूमि की समग्र जानकारी प्रदान करता है। --- टम्टा समाज का मूल और खरेई में आगमन टम्टा जाति पारंपरिक रूप से ताम्रकार (तांबे और पीतल के बर्तनों की शिल्पकला) से जुड़ी रही है। ऐतिहासिक स्रोतों और लोककथाओं के अनुसार, टम्टा समुदाय मूलतः अल्मोड़ा और उसके आसपास के क्षेत्रों से सम्बंधित था। औपनिवेशिक काल और उससे पूर्व, जब ताम्र एवं कांस्य शिल्प की माँग बढ़ी, तब ये लोग अपने कौशल के आधार पर विभिन्न गाँवों में बसने लगे। खरेई क्षेत्र में इनकी बसावट १९वीं शताब्दी के अंतिम दशक से लेकर २०वीं शताब्दी के प्रथम भाग (लगभग १८८० से १९२० के बीच) में हुई मानी जाती है। यह बसावट मुख्यतः दो कारणों से हुई: 1. रोजगार की तलाश: उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में तांबे और पीतल के बर्तनों की बहुत मांग थी। 2. स्थायित्व और भूमि: खरेई क्षेत्र में कृषि योग्य भूमि और अपेक्षाकृत शांत सामाजिक वातावरण ने इन्हें यहां बसने को प्रेरित किया। धार्मिक पहचान: बौद्ध या सनातनी? टम्टा समाज की धार्मिक पहचान पर गहराई से विचार किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि: ऐतिहासिक रूप से टम्टा समाज हिंदू धर्म का ही हिस्सा रहा है, विशेषकर शैव और वैष्णव परंपराओं से जुड़े रहे हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि टम्टा जाति की उत्पत्ति बौद्ध प्रभाव वाले समुदायों से हो सकती है, विशेषकर ताम्र-शिल्प और लोहार जातियों में बौद्ध धर्म का एक समय प्रभाव रहा। किंतु उत्तराखंड के टम्टा समाज में बौद्ध धार्मिक पहचान का कोई स्पष्ट सामाजिक व्यवहारिक प्रमाण नहीं मिलता। वर्तमान में टम्टा समाज सनातन धर्म (हिंदू धर्म) का हिस्सा है। वे देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, लोक देवताओं जैसे गोलू देवता, गंगनाथ, बासु देवता के प्रति आस्था रखते हैं। इस प्रकार, टम्टा समाज कभी मुख्यधारा बौद्ध नहीं रहे, बल्कि सांस्कृतिक रूप से प्रारंभ से ही हिंदू समाज से जुड़े रहे हैं। सांस्कृतिक विरासत और जीवनशैली टम्टा समाज की सांस्कृतिक धरोहर समृद्ध रही है: लोक संगीत और नृत्य: झोड़ा, छपेली, जागर जैसे लोक नृत्य इनके जीवन का हिस्सा हैं। त्योहार: हरेला, इगास, घी संक्रांति, मकर संक्रांति, होली आदि को पारंपरिक रूप से मनाते हैं। भाषा: इनकी संवाद भाषा कुमाऊँनी है, जिसमें विशिष्ट शब्दावली होती है। पोशाक: पारंपरिक कुमाऊँनी पोशाक, जैसे घाघरा-चोली (महिलाएं) और धोती-कुर्ता (पुरुष), त्योहारों और आयोजनों में प्रयुक्त होती है। विवाह टम्टा समाज की संस्कृति में एक प्रमुख सामाजिक आयोजन होता है। उनकी प्रमुख विशेषताएं हैं: वर-वधू चयन समाज के भीतर गोत्र परंपरा का पालन करते हुए होता है। 'न्यौतना' परंपरा के अनुसार विवाह प्रस्ताव भेजा जाता है। धार्मिक कर्मकांड: विवाह संस्कार पूरी तरह वैदिक रीति से ब्राह्मणों द्वारा संपन्न होता है। मांगलिक गीतों और लोक नृत्यों का विशेष स्थान होता है। पहले विवाह समाज के भीतर ही होते थे, लेकिन वर्तमान में शिक्षा के विस्तार से कुछ परिवर्तन हुए हैं। सामाजिक पिछड़ापन: कारण और प्रभाव टम्टा समाज की सामाजिक स्थिति ऐतिहासिक रूप से पिछड़ी मानी जाती रही है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित रहे: 1. कर्म आधारित व्यवस्था में इन्हें "शिल्पकार" वर्ग माना गया, जिससे सामाजिक दर्जा कमतर रहा। 2. शिक्षा से वंचितता: लंबे समय तक ये समुदाय शिक्षा से दूर रहे, जिससे आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी पिछड़े रहे। 3. सरकारी संरक्षण की कमी: सामाजिक उत्थान की योजनाओं तक इनकी पहुँच देर से हुई। 4. धार्मिक आयोजनों में सीमित सहभागिता के कारण भी इन्हें सामाजिक मुख्यधारा से कुछ दूरी पर रखा गया। हालांकि अब स्थिति तेजी से बदल रही है। शिक्षा, सरकारी सेवा और सामाजिक संगठनों में सक्रियता ने नई चेतना लाई है। खरेई क्षेत्र में टम्टा समाज की उपस्थिति केवल बसावट की कहानी नहीं है, यह संघर्ष, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक जागरूकता की यात्रा है। इनका इतिहास हमें यह सिखाता है कि किसी भी समाज की पहचान केवल उसके कार्य से नहीं, बल्कि उसके आत्मसम्मान, शिक्षा और एकजुटता से बनती है। टम्टा समाज आज नई पीढ़ी के साथ बदलाव की राह पर है, जो अतीत की विरासत और भविष्य की आकांक्षाओं को साथ लेकर चल रहा है।