ऐतिहासिक मस्जिद को संरक्षित करने को आगे आए हिंदू, गांव में नही एक भी मुस्लिम परिवार
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ऐतिहासिक मस्जिद को संरक्षित करने को आगे आए हिंदू, गांव में नही एक भी मुस्लिम परिवार
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शामली। देश में इन दिनों धार्मिकएफ टिप्पणियों को लेकर माहौल गर्म है, लेकिन इसके उलट यूपी के शामली से साम्प्रदायिक सद्भाव और भाईचारे को बढ़ाने वाली बड़ी पहल सामने आई है. यहां पर बगैर मुस्लिम आबादी वाले एक गांव के हिन्दू समाज के लोगों ने मुगल सल्तनत के इतिहास से जुड़ी जीर्ण—शीर्ण हालत में पड़ी मस्जिद के संरक्षण का बीड़ा उठाया है.
शामली जिले के गौसगढ़ गांव का एक समृद्ध इतिहास रहा है, जो कम ही लोगों को पता है. यहां पर मुगल शासन के दौरान 1760 से 1806 के बीच एक समृद्ध रियासत हुआ करती थी. फिलहाल 300 से अधिक वर्षों के बाद यहां पर एक जीर्ण-शीर्ण मस्जिद समेत शानदार अतीत के कुछ ही निशान बचे हैं. गांव में मुसलमानों के नहीं रहने के कारण, 1940 के बाद से यहां अजान और दुआ तक नहीं की गई है. अब गांव के हिंदुओं ने सदियों पुरानी इस संरचना में जान डालने के लिए कदम आगे बढ़ाया है.
दरअसल, गौसगढ़ गांव में स्थित मस्जिद के संरक्षण का बीड़ा ग्रामीणों ने सामाजिक कार्यकर्ता चौधरी नीरज रोड़ के नेतृत्व में उठाया है, वें वर्तमान में ग्राम प्रधान के पति भी हैं. नीरज रोड़ ने बताया कि ग्राम पंचायत के सभी 13 सदस्य अपनी राय में एकमत हैं कि इस मस्जिद को संरक्षित करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह अतीत में इस क्षेत्र के महत्व को प्रदर्शित करने वाली एकमात्र विरासत बची है. उन्होंने बताया कि विभिन्न गांवों और जिलों से बहुत सारे मुसलमान इस जगह पर मस्जिद को देखने के लिए आते हैं. हम इसे धार्मिक पर्यटन स्थल में बदलने के लिए वित्तीय पहलुओं पर भी काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि मस्जिद परिसर लगभग 3.5 बीघा में फैला हुआ है, लेकिन इसकी अधिकांश खाली भूमि पर "अतिक्रमण" किया गया है, जिसको हटाने के लिए सभी लोगों में सहमति भी बन गई है.उन्होंने बताया कि 'अगर मस्जिद की कोई जमीन किसान के खेत पर पड़ती है, तो सभी किसान बातचीत के बाद उसे छोड़ने के लिए तैयार हैं. हम सभी चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित किया जाए. किसान ने बताया कि यह मस्जिद देश में सांप्रदायिक सद्भाव का उदाहरण बन सकती है.लेकिन उन्हें अभी मस्जिद का दायरा कहा तक है नहीं पता जिसके लिए उन्हें प्रशासन के सहयोग की जरूरत है.वहीं गांव के लोगो ने बताया कि इस स्थल पर धूल-मिट्टी जम गई है. मौके पर सफाई सुनिश्चित करने के लिए 50-60 ग्रामीणों की टीम बनाई गई है. इस स्थान पर मस्जिद को देखने के लिए कई मुसलमान भी आते रहते हैं. ऐसे में इस धरोहर की सुरक्षा बेहद जरूरी है. उन्होंने बताया कि हम सरकार से इस कार्य में मद्द करने की उम्मीद करते हैं.ग्रामीणों ने बताया कि कई साल पहले इस स्थान पर बाहरी लोग आकर रात के समय खजाना खोजने के लिए खुदाई करते थे. ग्रामीणों को सुबह गहरे गड्ढे दिखाई देते थे. गहरी खुदाई होने की वजह से भी मस्जिद की इमारत को नुकसान पहुंचा है. समाजसेवी नीरज रोड़ ने बताया कि मस्जिद के संरक्षण का कार्य शुरू करने के लिए अधिकारियों संपर्क किया जा रहा है. इसके बाद अतिक्रमण को हटाया जाएगा और परिसर की सफाई करते हुए चारदीवारी बनाई जाएगी. उन्होंने बताया कि इस उद्देश्य को लेकर ग्राम पंचायत सदस्यों की बैठक भी हो चुकी है.गौरतलब है कि मस्जिद गुलाम कादिर के महल के अंदर बनाई गई थी. समय के साथ महल का अस्तित्व समाप्त हो गया और केवल मस्जिद के खंडहर ही रह गए. इतिहासकारों के अनुसार गुलाम कादिर नजीब-उद-दौला का पोता था, जिसने नजीबाबाद (बिजनौर में) की स्थापना की थी. वह दिल्ली की घेराबंदी और लूट के दौरान मुगल सल्तनत के बादशाह शाह आलम द्वितीय को प्रताड़ित और उसे अंधा करने के लिए कुख्यात है.