Kati Jaa Rahi Hai Umar Dhire Dhire | Jagjit Singh
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ग़ज़ल — कटती जा रही है उम्र धीरे-धीरे
कटती जा रही है उम्र धीरे-धीरे,
छूटता जा रहा है सब धीरे-धीरे।
कल जिन ख़्वाबों को आँखों में सजाया था,
होते जा रहे हैं वो कम धीरे-धीरे।
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सुबह होती है तो काम निकल पड़ता है,
शाम आती है तो थककर घर लौटता है।
दिन तो गुज़र जाते हैं हर रोज़ मगर,
कहाँ गुज़र गया ये जनम धीरे-धीरे।
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कभी दोस्तों के साथ हँसा करते थे,
बेवजह घंटों बातें किया करते थे।
अब फ़ोन में सबके नंबर तो हैं मगर,
बातें हो गईं कम धीरे-धीरे।
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माँ की आवाज़ में अब उम्र सुनाई देती है,
बाप की ख़ामोशी भी कुछ कहती है।
हम कमाने में इतने मशगूल रहे,
घर हो गया उनसे दूर धीरे-धीरे।
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कभी सोचा था बड़ा होकर आज़ाद होंगे,
अपने सपनों के ख़ुद ही मालिक होंगे।
बड़े हुए तो ये जाना दुनिया में,
ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, ख़्वाब नहीं।
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आईना रोज़ कुछ नया बताता है,
चेहरा भी अब पहले सा नहीं नज़र आता है।
कल तक जिस उम्र को दूर समझते थे,
वही आ गई सामने धीरे-धीरे।
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कुछ लोग मिले, कुछ रास्ते छूट गए,
कुछ अपने बिना कहे ही रूठ गए।
हम हिसाब लगाते रहे किसे खोया,
और वक़्त निकलता रहा धीरे-धीरे।
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मुखड़ा
कटती जा रही है उम्र धीरे-धीरे,
घटती जा रही है उम्र धीरे-धीरे।
जिस ज़िंदगी को जीना था खुलकर कभी,
वो गुज़रती जा रही है यूँ ही धीरे-धीरे।
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अब शिकायत भी किससे करें हम,
वक़्त के आगे किसकी चली है।
कल की फ़िक्र में आज खो दिया,
और आज की फ़िक्र में कल चली है।
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“फ़लक” एक दिन बैठकर सोचा हमने,
क्या कमाया और क्या छोड़ आए?
उम्र भर दुनिया को पाने निकले थे,
आख़िर में ख़ुद को ही खोजते रह गए।