डिक्री क्या है | डिक्री कितने प्रकार की होती है | प्रारंभिक डिक्री और अंतिम डिक्री में अंतर
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डिक्री क्या है | डिक्री कितने प्रकार की होती है | प्रारंभिक डिक्री और अंतिम डिक्री में अंतर
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डिक्री क्या है | डिक्री कितने प्रकार की होती है | प्रारंभिक डिक्री और अंतिम डिक्री में अंतर
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2. आज्ञप्ति (Decree) धारा 2 (2)
आज्ञप्ति से ऐसे न्यायनिर्णयन की औपचारिक अभिव्यक्ति (Formal expression) अभिप्रेत है जो कि वाद में के सब या किन्हीं विवादास्पद विषयों के सम्बन्ध में पक्षकारों के अधिकारों को वहाँ तक निश्चायक रूप से अवधारित करता है, जहाँ तक कि उसे अभिव्यक्त करने वाले न्यायालय का सम्बन्ध है और वह प्रारम्भिक या अन्तिम हो सकेगी। इसके अन्तर्गत वादपत्र की अस्वीकृति और धारा 144 के अन्तर्गत किसी प्रश्न का अवधारण भी समझा जायेगा, । किन्तु उसमें-
(अ) ऐसा कोई न्यायनिर्णयन नहीं होगा, जिसकी अपील आदेश की तरह होती है; या (ब) चूक (default) के लिए खारिज करने का कोई आदेश ।
स्पष्टीकरण
डिक्री तब प्रारम्भिक होती है, जब वाद के पूर्णरूपेण से निपटा दिये जा सकने के पहले आगे कार्यवाहियां की जानी हैं । वह तब अन्तिम होती है जबकि ऐसा न्यायनिर्णयन वाद को पूर्ण रूप से निपटा है । वह भागतः प्रारम्भिक और भागत: अन्तिम हो सकेगी।
आज्ञप्ति के लिए आवश्यक बातें -
आज्ञप्ति के लिए मुख्य रूप से निम्न बातें आवश्यक हैं
(i) वाद का निस्तारण हो गया हो;
(ii) वाद का निस्तारण डिक्री (आज्ञप्ति) द्वारा हुआ हो; एवं
(iii) ऐसा निस्तारण किसी सिविल या राजस्व न्यायालय द्वारा अन्तिम रूप से हुआ हो 2
(iv) निश्चायक रूप से पक्षकारों के अधिकारों का अवधारण हो गया हो;
(v) व्यतिक्रम में वाद के खारिज होने के आदेश की अभिव्यक्ति न हो;
(vi) न्यायनिर्णयन की प्ररूपिक अभिव्यक्ति की गयी हो; तथा
(vii) ऐसे न्यायनिर्णयन की अपील, आदेश के अपील की तरह नहीं होती हो ।
इस प्रकार उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 85 के अन्तर्गत वाद का निपटारा करने वाला पारित कोई आदेश संहिता की धारा 2 (2) के अर्थों में एक आज्ञप्ति होगा 3
लेकिन परिसीमा के आधार पर अपील के ज्ञापन को खारिज़ करने वाला आदेश डिक्री नहीं माना जायेगा 4
लीला होटल्स लि० बनाम हाउसिंग एण्ड अरबन डेवलपमेन्ट कॉरपोरेशन के मामले में माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के अधीन पारित पंचाट को डिक्री के तुल्य माना गया है। (Award passed under Arbitration & Conciliation Act tentamounts to a decree).
कन्हैयालाल कोकानी बनाम अम्बिका सप्लाई एण्ड सर्विसेज प्रा० लि०० के मामले में गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा वाद को खारिज किये जाने के आदेश को डिक्री माना गया है। (Order of rejection of plaint amounts to decree.)
'छेलाराम बनाम माषक" के मामले में भी राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा यही अभिनिर्धारित किया गया है कि वाद या अपील को अवधिरुद्ध ( barred by limitation) बनाने वाला आदेश डिक्री नहीं है क्योंकि इससे पक्षकारों के अधिकारों का विनिश्चय नहीं होता है।
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