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रामचरितमानस · रामा बालकाण्ड श्लोक दोन स्पष्टीकरण

भागवत कथा

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रामचरितमानस · रामा बालकाण्ड श्लोक दोन स्पष्टीकरण

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भागवत कथा
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गुरु के चरणों की रज कोमल और सुन्दर अंजन है, नेत्रों के लिए अमृत है और दृष्टि के दोषों को नष्ट करने वाली है। उसी से विवेकरूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं श्रीराम के उस चरित्र का वर्णन करता हूँ जो भवबन्धन से छुड़ाने वाला है। सबसे पहले मैं भूदेव ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो मोह से उत्पन्न सारे संशयों को हर लेते हैं। सज्जनों के समाज को, जो समस्त गुणों की खान है, मैं प्रेमपूर्वक मधुर वाणी से प्रणाम करता हूँ। सन्तों का चरित्र कपास के शुभ चरित्र के समान है, जिसका फल नीरस, उज्ज्वल और गुणमय होता है; वह स्वयं दुख सहकर दूसरों के छिद्रों को ढकता है और इसी से जगत में वन्दनीय यश पाता है। सन्तों का समाज आनन्द और मंगल से भरा हुआ है; वही जगत का चलता-फिरता तीर्थराज है। वहाँ श्रीराम की भक्ति गंगा की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वती है। विधि-निषेधमयी तथा कलियुग के मल को हरने वाली कर्म की कथा ही सूर्यपुत्री यमुना कही गई है। हरि और हर की कथाएँ वहाँ त्रिवेणी बनकर सुशोभित होती हैं, जो सुनते ही सबको आनन्द और मंगल देती हैं। अटल विश्वास ही अक्षयवट है और अपना धर्म ही इस तीर्थराज के समाज का सुकर्म है। यह तीर्थ सब दिन और सब देशों में सबको सुलभ है; आदरपूर्वक सेवन करने पर यह सारे क्लेशों को शान्त कर देता है। यह तीर्थराज अकथनीय और अलौकिक है, इसका प्रभाव प्रत्यक्ष है और यह तत्काल फल देता है। जो लोग इसे सुनकर समझते हैं और प्रसन्न मन से अत्यन्त अनुराग के साथ इसमें डुबकी लगाते हैं, वे इसी शरीर के रहते चारों फल प्राप्त कर लेते हैं — क्योंकि सन्तों का समाज ही प्रयाग है।