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#बारहमासा :# मुनिराज का#स्वर श्रीमती संगीता जैन वलसाड# गुजरात

TARAN PANTH DESHANA

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#बारहमासा :# मुनिराज का#स्वर श्रीमती संगीता जैन वलसाड# गुजरात

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TARAN PANTH DESHANA
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बारहमासा : मुनिराज का स्वर श्रीमती संगीता जैन वलसाड गुजरात Recording:- Heart Beats studio Jabalpur Music:- Bablu Maithyuz Jabalpur मैं बन्दूॅ साधु महन्त बड़े गुणवन्त सभी चित लाके । जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । टेक ।। चित चैत में व्याकुल रहे काम तन दहे न कुछ बन आवे, फूली वनराई देख मोह भ्रम छावे । जब शीतल चले समीर स्वच्छ हो नीर भवन सुख भावे, किस तरह योग योगीश्वर से बन आवे । तिस अवसर श्री मुनि ज्ञानी रहें अचल ध्यान में ध्यानी, जिन काया लखी पयानी जग ऋद्धि खाक सम जानी। उस समय धीर धर रहैं अमर पद लहैं ध्यान शुभ ध्याके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । १ । । जब आवत है वैशाख होय तृण खाक तप्त से जल के, सब करें धाम विश्राम पवन झल झल के । ऋतु गर्मी में संसार पहिन नर नार वस्त्र मलमल के, वे जल से करते नेह जो है जी स्थल के । तिस समय मुनि महाराज तन नग्न शिखर गिरि राजे, प्रभु अचल सिंहासन राजे कहो क्यों न कर्म दल लाजे । जो घोर महातप करें मोक्ष पद धरें बसे शिव जाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । २ । । जब पड़े जेठ में ज्वाला होय तन काला धूप की मारी, घर बाहर पग नहीं धरे कोई घरवारी । पानी से छिड़कें धाम करें विश्राम सकल नरनारी, घर खस की टटियाँ छिपैं लूह की मारी। मुनिराज शिखर गिर ढाँड़े दिन रैन ऋद्धि अति बाढ़े, अति तृषा रोग भय बाढ़े तब रहैं ध्यान में गाढ़े। सब सूखे सरवर नीर जलै शरीर रहें समझाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । ३ । । आसाढ़ मेघ का जोर बोलते मोर गरजते बादल, चमके बिजली कड़कड़ें पड़ें धारा जल । अति उमड़े नदियाँ नीर नहर गम्भीर भरे जल से थल, भोगी को ऐसे समय पड़े कैसे कल । उस समय मुनि गुणवंते वटतरु तर ध्यान धरन्ते, अति काटें जीव अरु जन्ते नहीं उनका सोच करन्ते । वे काटें कर्म जँजीर नहीं दिलगीर रहें शिव पाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके॥४॥ श्रावण में है त्योहार झूलती नार चढ़ी हिंडोले, वे गावें राग मल्हार पहन नये चोले । जग मोह तिमिर मन बसे सर्व तन कसे देत झकझोले, उस अवसर श्री मुनिराज बनत हैं भोले । । वे जीतें रिपु से लरके, कर ज्ञान खङ्ग ले करके, शुभ शुक्ल ध्यान को धरके परफुल्लित केवल वरके । नहीं सहें वो यम की त्रास लहैं शिव दास अघात नशाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । ५ । । भादौं अंधियारी रात न सूझे हाथ घुमर रहे बादर, वन मोर पपीहा कोयल बोले दादुर । अति मच्छर भिन भिन करें, साँप फुंकरे पुकारें थलचर, बहु सिंह बघेरा गज घूमें वन अन्दर । । मुनिराज ध्यान गुण पूरे तब काटें कर्म अंकूरे, तनु लिपटत कान खजूरे मधु मक्ख ततइयें भूरे । चिटियों ने बिल तन करे आप मुनि खड़े हाथ लटकाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । ६ ॥ आश्विन में वर्षा गई समय नहीं रही दशहरा आया, नहिं रही वृष्टि अरु कामदेव लहराया। कामी नर करें किलोल बनावें डोल करें मन भाया, हैं धन्य साधु जिन आतम ध्यान लगाया। वसु याम योग में भीने मुनि अष्ट कर्म क्षय कीने, उपदेश सवन को दीने भविजन को नित्य नवीने । हैं धन्य धन्य मुनिराज ज्ञान के ताज नमूं शिर नाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके ।।७।। कार्तिक में आया शीत भई विपरीत अधिक शरदाई, संसारी खेलें जुआ कर्म दुखदाई। जग नर नारी का मेल मिथुन सुख केल करें मन भाई, शीतल ऋतु कामी जन को है सुखदाई । जब कामी काम कमावें मुनिराज ध्यान शुभ घ्यावें, सरवर तट ध्यान लगावें सो मोक्ष भवन सुख पावें । सुन महिमा अपरम्पार न पावे पार कोई नर गाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । ८ । । अगहन में टपके शीत यही जग रीत सेज मन भावे, अति शीतल चले समीर देह थर्रावे । श्रृंगार करे कामिनी रूप रस ठनी सामने आवे, उस समय कुमति बन सबका मन ललचावे । योगीश्वर ध्यान धरे हैं सरिता के निकट खड़े हैं, वहाँ ओले अधिक परे हैं मुनि कर्म का नाश करे हैं। जब पड़े बर्फ घनघोर करें नहीं शोर जयो दृढ़ता के, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके।।९।। यह पौस महीना भला शीत में धुला कांपती काया, वे धन्य गुरु जिन इस ऋतु में ध्यान लगाया। घरवारी घर में छिपें वस्त्र तन लिये रहे जैडाया, तज वस्त्र दिगम्बर हो मुनि ध्यान लगाया। जल के तट जग सुखदाई महिमा सागर मुनिराई, धर धीर खड़े हैं भाई निज आतम से लवलाई । है यह संसार असार वे तारणहार सकल वसुधा के, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । १० ।। हैं माघ बसंत, बसंत नार, अरु कन्य युगल सुख पाते, ये पहने वस्त्र बसंत फिरें मदमाते । जब चढ़ें मदन को शयन पड़े नहीं चैन कुमति उपजाते, हैं बड़े धीर जन बहुधा वे डिंग जाते। तिस समय जु हैं मुनि ज्ञानी जिन काया लखी पयानी, भवि डूबत बोधे प्रानी जिन ये वसन्त जिय जानी । चेतन सों खेलें होरी ज्ञान पिचकारी योग जल लाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । ११ । । जब लगे महीना फाग करें अनुराग सभी नर नारी, लै फिरें फेंट में गुलाल कर पिचकारी । तब श्री मुनिवर गुणखान अचल धर ध्यान करें तप भारी, कर शील सुधारस कर्मन ऊपर डारी । कीर्ति कुमकुमें बनावें कर्मों से फाग रचावें, जो बारा मासा गावें सो अजर अमर पद पावें । यह भाखें जियालाल धर्म गुण माल योग दर्शाके, जिन अथिर लखा संसार बसे वन जाके । । १२ । ।