Перейти к содержимому

#भक्तामर #bhaktamar #Bhaktamar

jain vibes life_satvik life

0:00 / 0:00

#भक्तामर #bhaktamar #Bhaktamar

1 284 просмотра · 2 недели назад
jain vibes life_satvik life
171 подписчик
1 284 просмотра · 2 недели назад
​#jain-vibes-19s ​#BhaktamarStotra ​#Jainism ​#JainStotra ​#JainBhakti ​#AdinathBhagwan भक्तामर स्तोत्र संस्कृत का एक अत्यंत पवित्र पाठ है, जिसमें 48 काव्य (श्लोक) हैं। यहाँ भक्तामर स्तोत्र के प्रारंभिक एवं प्रमुख काव्य (अर्थ सहित) दिए गए हैं, जिन्हें आप अपने वीडियो के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं: श्री भक्तामर स्तोत्र (संस्कृत एवं हिन्दी अर्थ) काव्य 1 भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥१॥ अर्थ: युग के प्रारंभ में, संसार-समुद्र में गिरते हुए प्राणियों के लिए एकमात्र सहारा, तथा प्रणाम करते हुए भक्तों के मुकुटों की मणियों की कांति को बढ़ाने वाले और पाप-रूपी अंधकार को नष्ट करने वाले, श्री आदिनाथ भगवान के चरण-कमलों को मैं मन-वचन-काय से प्रणाम करता हूँ। काव्य 2 यः संस्तुतः सकल-वाङ्‌मय-तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि-पटुभिः सुर-लोक-नाथैः। स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारैः, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥२॥ अर्थ: संपूर्ण शास्त्र के तत्व-ज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि के द्वारा चतुर, स्वर्ग के देवों के स्वामियों (इंद्रों) ने तीनों लोकों के मन को हरने वाले सुंदर स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति की है, उन्हीं प्रथम जिनेन्द्र श्री आदिनाथ भगवान की स्तुति करने का प्रयास मैं (एक साधारण प्राणी) भी करता हूँ। काव्य 3 बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ! स्तोतुं समुद्यतो मति-संततौ त्वाम्। बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्था क इच्छति जन सहसा ग्रहीतुम्॥३॥ अर्थ: हे देवों द्वारा पूजित चरण-पीठ वाले प्रभु! मैं बुद्धिहीन होते हुए भी आपकी स्तुति करने के लिए तैयार हुआ हूँ। जैसे जल में दिखाई देने वाले चंद्रमा के प्रतिबिंब को बाल-बुद्धि बालक के अलावा और कौन पकड़ने की इच्छा कर सकता है? (अर्थात बिना बुद्धि के आपकी पूर्ण स्तुति करना बालक द्वारा जल के चाँद को पकड़ने जैसा है)। काव्य 4 वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशांक-कान्तान्, कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या। कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं, को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥४॥ अर्थ: हे गुण-समुद्र! चंद्रमा के समान उज्ज्वल आपके सर्वश्रेष्ठ गुणों का वर्णन करने में बृहस्पति के समान बुद्धिमान पुरुष भी असमर्थ है। प्रलय काल की वायु से प्रचंड लहरों और मगरमच्छों से भरे समुद्र को अपनी भुजाओं से तैरकर कौन पार कर सकता है? अंतिम काव्य (काव्य 48) जय जिनेंद्र 🙏 भक्तामर स्तोत्र (Bhaktamar Stotra) आचार्य मानतुंग महाराज द्वारा रचित श्री आदिनाथ भगवान की भक्ति का अति प्रभावशाली और चमत्कारिक स्तोत्र है। इसके नित्य पाठ व श्रवण से जीवन में शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि आपको यह स्तोत्र पसंद आए तो कृपया वीडियो को Like करें, Share करें और हमारे चैनल को Subscribe अवश्य करें। 🌸 जय जिनेंद्र 🌸 -------------------------------------------------- 🔔 Subscribe to Jain Vibes:    / @jain-vibes-19s   -------------------------------------------------- #BhaktamarStotra #Jainism #JainStotra #AdinathBhagwan #JainChanting #JainVibes #JainBhakti #PeacefulMantra इत्थं समाहित-धियो विधिनैव काव्या- दाशां मया रचित-मेतदपार-दोषम्। तद्वत्-कथा-गुण-समृद्ध-मशेष-दोषं, स्तोत्रं मया रचित-ममलमम्बु-तुल्यम्॥४८॥ अर्थ: इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर भक्तिभाव से मैंने इस स्तोत्र की रचना की है। जो मनुष्य इस निर्मल स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह सब दुखों से मुक्त होकर परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है। यदि आपको पूरे 48 श्लोक संस्कृत, हिंदी अनुवाद या ऑडियो फॉर्मेट की सहायता चाहिए, तो बताएं! pls comment jai jinendra