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मनुष्य का शरीर क्यों मिला है ? और मिलने के बाद क्या करना चाहिए? 🙏 #ShriRamUpdesh #ManushyaJeevan

शांति का मार्ग

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मनुष्य का शरीर क्यों मिला है ? और मिलने के बाद क्या करना चाहिए? 🙏 #ShriRamUpdesh #ManushyaJeevan

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शांति का मार्ग
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कल्पना कीजिए... अयोध्या में संध्या का समय है। राजमहल में घी के दीये जल रहे हैं। सिंहासन पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बैठे हैं। सामने पूरी सभा बैठी है - गुरु वशिष्ठ, ब्राह्मण, ज्ञानीजन और अयोध्या की सारी प्रजा। चारों तरफ शांति है। तब श्री राम ने हाथ जोड़कर, बहुत ही करुणा भरे स्वर में अपनी प्रजा से वो बात कही, जो आज तक हर भटके हुए मनुष्य के लिए दिशा बनी हुई है। आज का हमारा 1 घंटे का ये विशेष LIVE सत्संग उसी पन्ने पर आधारित है जो आप स्क्रीन पर देख रहे हैं - रामचरितमानस सार सटीक, सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड, पृष्ठ 234-235, दोहा 653 से 660। आज हम एक-एक चौपाई को सिनेमा की तरह जिएंगे - 1. बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहि गावा।। सारे वेद-शास्त्र चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि ये मनुष्य का शरीर बड़े भाग्य से मिलता है। देवता भी इसके लिए तरसते हैं। क्यों? क्योंकि देव-योनि तो सिर्फ भोग की योनि है, वहाँ साधना नहीं हो सकती। 2. साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा।। तुलसीदास जी कहते हैं ये शरीर साधना का धाम है, मोक्ष का दरवाजा है। इसको पाकर भी जिसने अपना परलोक नहीं सुधारा, उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। यहाँ परलोक का मतलब स्वर्ग नहीं, मोक्ष है। जैसा कि हाथरस वाले तुलसी साहब ने कहा है - नर तन दुर्लभ देव को, सब कोइ कहत पुकार। देवता भी कहते हैं ये शरीर हमें नहीं मिलता। 3. एहि तन कर फल विषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।। हे भाई! इस शरीर का फल विषय-भोग - रूप, रस, गंध, स्पर्श खाना-पीना नहीं है। अगर तुमने पुण्य करके स्वर्ग भी पा लिया तो वो भी थोड़े दिन का है, अंत में दुख ही देगा। पुण्य खत्म, फिर नीचे गिरना पड़ेगा। 4. नर तनु पाइ विषय मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।। जो मनुष्य शरीर पाकर भी दिन-रात विषयों में मन लगाए रहते हैं, वो मूर्ख अमृत को पलट कर विष पी रहे हैं। 5. ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।। जो पारस मणि को खोकर घुंघची का दाना ले ले, उसे कोई भी अच्छा नहीं कहता। वैसे ही मनुष्य देह रूपी पारस मणि को खोकर विषय रूपी घुंघची लेना महा-मूर्खता है। 6. आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जीव अविनासी।। फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।। ये अविनाशी जीव चार खान - अंडज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज में, 84 लाख योनियों में काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से घिरा हुआ, माया की प्रेरणा से हमेशा भटकता रहता है। 7. कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।। और तब, बिना किसी कारण के करुणा करने वाले, बिना हेतु के प्रेम करने वाले ईश्वर, कभी-कभी दया करके इस जीव को मनुष्य शरीर दे देते हैं। 1 घंटे के LIVE का Flow - 00:00 - मंगलाचरण और आज के प्रसंग का सिनेमैटिक परिचय 08:00 - बड़े भाग मानुष तन पावा की गहरी व्याख्या 20:00 - साधन धाम मोक्ष कर द्वारा - हमारा असली लक्ष्य क्या होना चाहिए? 32:00 - स्वर्ग भी दुखदाई क्यों? और अमृत vs विष की कहानी 45:00 - 84 लाख योनियों का चक्र और ईश्वर की अहैतुकी कृपा 58:00 - आपके सवाल-जवाब और शांति पाठ ये शरीर बार-बार नहीं मिलेगा। इस लाइव को अंत तक सुनो, हो सकता है आज ही तुम्हारे जीवन की दिशा बदल जाए। कमेंट में जय श्री राम लिखकर बताओ आप कहाँ से लाइव देख रहे हो। शांति का मार्ग - हरिद्वार #BadeBhagManushTanPawa #Ramcharitmanas #Uttarkand #ShriRamUpdesh #SadhandhamMokshKarDwara #JaiShreeRam #RamKatha #SanatanDharma #TulsiDas #84LakhYoni #MokshaMarg #ShantiKaMarg #HaridwarSatsang #Ayodhya #BhaktiGyan