मन लग गया रे फकीरी में | माया-मोह से मुक्ति | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video
Divine Bhakti Vibes
0:00 / 0:00
मन लग गया रे फकीरी में | माया-मोह से मुक्ति | कबीर प्रेरित भजन | Lyrical Video
1 184 просмотра · 2 дня назад
Divine Bhakti Vibes
1,01 тыс. подписчиков
1 184 просмотра · 2 дня назад
मन लग गया रे फकीरी में… 🙏
माया, मोह, धन, मान और दुनिया की दौड़ से भीतर की शांति की ओर लौटने की एक आत्मिक यात्रा।
यह कबीर की निर्गुण भक्ति और फकीरी दर्शन से प्रेरित मौलिक भजन है। गीत उस मन की कहानी कहता है जो संसार में बहुत कुछ जोड़ने के बाद समझता है कि सच्ची अमीरी बाहर नहीं, भीतर है।
“माया छूटी, मोह भी छूटा,
छूटा झूठा फेर…”
जब मन भीतर की ओर मुड़ता है, तब फकीरी हार नहीं लगती—वही सबसे बड़ी आज़ादी बन जाती है।
🎵 Song: मन लग गया रे फकीरी में
🪕 Genre: Nirgun Folk / Kabirana Bhajan
🙏 Theme: माया-मोह से मुक्ति, फकीरी, आत्मबोध और भीतर की शांति
🎙️ Vocal: Raw Earthy Male Folk Vocal
🎼 Style: Traditional Indian Nirgun Folk
📺 Format: Lyrical Video
🕉️ LYRICS
[INTRO]
सोना गिना, चाँदी गिनी,
गिनता रहा संसार…
जितना जोड़ा, उतना पाया —
मन फिर भी लाचार।
माया तेरी चाल समझ ली,
अब न तेरा जाल…
मन लग गया रे फकीरी में…
मन लग गया रे फकीरी में…
[VERSE 1]
दस कोठी और सौ ताले,
फिर भी मन कंगाल…
जिस माया को सींच रहा था,
वही बनी जंजाल।
मंदिर ढूँढा, मस्जिद ढूँढी,
ढूँढे चारों धाम…
जिस दिन भीतर झाँक लिया रे,
मिल गया मेरा राम।
[CHORUS]
मन लग गया रे फकीरी में,
मन लग गया रे…
माया छूटी, मोह भी छूटा,
छूटा झूठा फेर…
मन लग गया रे फकीरी में,
अब किस बात का डर?
[VERSE 2]
जात की गठरी फेंक दी मैंने,
फेंकी झूठी शान…
जिसको नीचा कहता था मैं,
उसमें देखा प्राण।
पोथी पढ़-पढ़ थक गया था,
बढ़ता गया गुमान…
एक फकीर की आँख में देखा,
सारा वेद-पुराण।
[SPOKEN]
अरे ओ मनवा…
कितना भागेगा?
किसके पीछे?
धन के पीछे?
नाम के पीछे?
जिसको पाने निकला था…
वो तेरे भीतर बैठा था।
माया से तू जीत न पाया…
फिर माया को दोष क्यों देता है?
गठरी खोल…
सब रख दे…
और सुन…
अब कुछ नहीं चाहिए।
[VERSE 3]
लोग कहें तू हार गया रे,
मैं कहूँ मिली जीत…
दुनिया जीत के क्या करना है,
जब मन में न प्रीत?
रोटी आधी, नींद पूरी,
आकाश मेरा छत…
कबिरा बोले यही अमीरी,
बाकी सब है ऋण।
[FINAL CHORUS]
मन लग गया रे फकीरी में,
मन लग गया रे…
माया छूटी, मोह भी छूटा,
छूटा जग का फेर…
मन लग गया रे फकीरी में,
अब किस बात का डर?
ना तख़्त चाहिए, ना ताज चाहिए,
ना दुनिया का दरबार…
कबिरा बोले फकीरी में ही,
मिलता सच्चा प्यार।
[FINAL SPOKEN TAG]
ना कुछ मेरा…
ना कुछ तेरा…
जिसे छोड़ दिया…
वही तो बोझ था।
[OUTRO]
ना धन चाहिए…
ना मान चाहिए…
ना झूठा संसार…
दो रोटी…
खुला आकाश…
और भीतर का प्यार…
मुट्ठी खाली…
मन उजियारा…
छूट गया सब पीर…
कबिरा बोले…
अब क्या लेना…
अब क्या देना…
मन लग गया रे…
फकीरी में…
मन लग गया रे…
फकीरी में…
⸻
🙏 अगर यह भजन आपके मन को छू जाए, तो Comment में लिखें — “मन लग गया रे…”
❤️ Like | 🔔 Subscribe | 📤 Share
Disclaimer: यह एक मौलिक, कबीर-प्रेरित रचना है। यह संत कबीर के मूल/ऐतिहासिक पद या प्रमाणित दोहों का पाठ नहीं है।
⸻
🔥 HASHTAGS
#मनलगगयारेफकीरीमें #कबीरप्रेरितभजन #कबीरभजन #कबीर #Kabir #KabirBhajan #KabirInspired #NirgunBhajan #Nirgun #Kabirana #KabiranaBhajan #Fakiri #Bhajan #HindiBhajan #MayaMoh #SpiritualBhajan #SufiFolk #IndianFolk #LyricalVideo