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कानों में कंगना (Kanon Mein Kangana; کانوں میں کنگنا) | Raja Radhika Raman Prasad Singh

Kahani Depot (कहानी डिपो)

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कानों में कंगना (Kanon Mein Kangana; کانوں میں کنگنا) | Raja Radhika Raman Prasad Singh

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हृषीकेश के पास एक सुंदर वन है; सुंदर नहीं अपरूप सुंदर है। वह प्रमोदवन के विलास-निकुंजों जैसा सुंदर नहीं, वरंच चित्रकूट या पंचवटी की महिमा से मंडित है। वहाँ चिकनी चाँदनी में बैठकर कनक घुँघरू की इच्छा नहीं होती, वरंच प्राणों में एक ऐसी आवेश-धारा उठती है, जो कभी अनंत साधना के कूल पर पहुँचाती है—कभी जीव-जगत के एक-एक तत्व से दौड़ मिलती है। गंगा की अनंत गरिमा—वन की निविड़ योग निद्रा वहीं देख पड़ेगी। कौन कहे, वहाँ जाकर यह चंचल चित्त क्या चाहता है—गंभीर अलौकिक आनंद या शांत सुंदर मरण। ...अब ऐसे वन नहीं, जहाँ कृष्ण गोलोक से उतरकर दो घड़ी वंशी की टेर दें। ऐसे कुटीर नहीं जिनके दर्शन से रामचंद्र का भी अंतर प्रसन्न हो, या ऐसे मुनीश नहीं जो धर्मधुरंधर धर्मराज को भी धर्म में शिक्षा दें। यदि एक-दो भूले-भटके हों भी, तब अभी तक उन पर दुनिया का परदा नहीं उठा—जगन्माया की माया नहीं लगी। लेकिन वे कब तक बचे रहेंगे? लोक अपने यहाँ अलौकिक बातें कब तक होने देगा! भवसागर की जल-तरंगों पर थिर होना कब सम्भव है? ...नरेंद्र! अब मैं चला, किरन तुम्हारे हवाले है। यह कहकर किसी की सुकोमल उँगुलियाँ मेरे हाथों में रख दीं। लोचनों के कोने पर दो बूँदें निकलकर झाँक पड़ीं। मैं सहम उठा। क्या उन पर सब बातें विदित थीं? क्या उनकी तीव्र दृष्टि मेरी अंतर-लहरी तक डूब चुकी थी? वह ठहरे नहीं, चल दिए। मैं काँपता रह गया, किरन देखती रह गई। #RajaRadhikaRamanPrasadSingh #राजाराधिकारमनप्रसादसिंह #KanonMeinKangana #कानोंमेंकंगना #HindiKahani #UGC #UPSC #12thhindi100 #HindiClassics #HindiStories #audiostories #audiostory #audiobooks #HindiKahani #HindiKahanian راجا رادھِکارمن پرساد سِنگھ کانوں میں کنگنا اکبر رضوی ہندی افسانہ