“अगर भगवान ने सब बनाया… तो भगवान को किसने बनाया? | अष्टावक्र”
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अगर भगवान ने इस पूरे संसार को बनाया है… तो फिर भगवान को किसने बनाया?
यह प्रश्न सुनने में जितना सरल है, भीतर से उतना ही गहरा है।
हम बचपन से सुनते आए हैं कि इस संसार का कोई रचयिता है। लेकिन जब मन उस रचयिता की ओर देखता है, तो एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है—
उसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई?
क्या हर चीज़ के पीछे किसी कर्ता का होना आवश्यक है?
क्या “पहला कारण” वास्तव में कोई उत्तर है?
और जिस भगवान की कल्पना हम अपने मन में करते हैं… क्या वह स्वयं भगवान है, या भगवान के बारे में हमारे मन द्वारा बनाई गई एक छवि?
इस संवाद में अष्टावक्र और राजा जनक इसी प्रश्न को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी जड़ तक जाने के लिए देखते हैं।
क्योंकि कभी-कभी सबसे गहरा उत्तर किसी विश्वास में नहीं होता।
बल्कि उस क्षण में होता है…
जब मन पहली बार ईमानदारी से कहता है—
“मैं नहीं जानता।”
और फिर प्रश्न बाहर नहीं रहता।
वह भीतर लौट आता है।
शायद भगवान की उत्पत्ति पूछने से पहले…
उस मन को देखना आवश्यक है,
जो हर अनंत चीज़ की शुरुआत खोजता है।
अगर आप केवल उत्तर नहीं, बल्कि अपने भीतर उठने वाले प्रश्नों को देखना चाहते हैं, तो इस संवाद को अंत तक सुनिए।
अष्टावक्र की दृष्टि में—
सत्य को मानना नहीं है…
उसे देखना है।
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