साँवरिया थारा काज समझ न आव ! राजस्थानी भजन! गायक गोपाल दास वैष्णव
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साँवरिया थारा काज समझ न आव ! राजस्थानी भजन! गायक गोपाल दास वैष्णव
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Singar gopal das vaishnav
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Sanwar lal vaishnav
हे स्वामी जी तेरा काज समज नाही आया .
नारी के दो शान बणाया ,
उण में दध बणे केसे ज कर बेठा वोई अमरपद पाया मुख मे दात बतीस कई ,
जीबया स्वाद करे केसे स्वामी जी तेरा . . . .
नेण निरखकर धागा ट्रकी कान स्बद सुनताकेसे धर अस्मानपवन ओर . पाणी . अगन बणाया तमकैसे ,
गन्ध सगन्धि लेत नाकसे वास अजब आता केसे चांद सुरज दोदिप बणाया ,
उनका गाट अलग केसे ,
चांद सुरज पूर्व से उगता ,
पिश्वम ने आता केसे ,
तारा तुने अजब बणाया ,
रेण दिवस होता केसे ,
चोला चमडी हे तन उपरे पूर्जा तो अजब बणाया सात दिप ओर नो खाण्डामें सब ने तोअलगसजाया स्वामी जी
तेरा . . . स्वामी जी तेरा . . .
हा बिजली चमके उपर गाजे ,
बादल मे जल रे केसे जल सा तुने गाट बणया ,
रूम रम चेतन केसे जलपे क्या निम जीम की ,
बादल अदर पदर केसे कुण बोलता गटके अन्दर , छुपालिया अन्दर केसे सात दिना का सातबार है ,
महिना साल बणियाकेसे सासा तेरी अजब बणाई ,
नामी में स्वास रहे केसे बावन अक्सर तुने बणाया ,
गिनती भेद अलग केसे कूण आता हे कूण जाता ,
ईण का भंद मिले केसे चीवदा लोग ओर चोवदा रतन येसब तुमने बणाया मरणजलम और दुखसुख का वोसभी फन्दकटाया स्वामी जी तोरा . . .
स्वामी जी तोरा . . .
हे लखाचोरासी जुण बणाई ,
सबका जीव अलग केसे बिज मूल के डाल बणया ,
पता फूल अलग केसे चार तुने खान बणाई ,
उनका नाम अलग केसे कई जडेली जडी बुटिया ,
खाता अमर मरे केसे नर नारी दो तीन बणाया ,
उनका रण अलग केसे आन्त्रमनन्द भारती जी गावे ,
तेरा जसण मिले केसे हाथपाव सब ऐक सरीका ,
मख पैसूरत अलगकेसे येसब लिला तूने फेलाई तमफिर अलग रया केसे हाड मांस ओर दुध गरब मैं रोसब तो अपने बणया तेरा करतब हे वो भारी ,
देख देखा गबराया स्वामी जी तोरा . . . स्वामी जी तेरा काज समज . . . . . . . . . . . . . . ? Sk 🎶 बड़ला ( आसिन्द )