Arey Man! Ubhaya Roop Jaga Jaan Part-2/2 || अरे मन! उभय रूप जग जान -भाग 2/2
Radha Govind Mandir, Chandigarh
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Arey Man! Ubhaya Roop Jaga Jaan Part-2/2 || अरे मन! उभय रूप जग जान -भाग 2/2
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Radha Govind Mandir, Chandigarh
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इस वीडियो के कुछ अंश हैं—
इस पद की व्याख्या में कल आपलोगों को बताया गया कि अब तक जितने आध्यात्मिक नेता हुए उन लोगों ने संसार के विषय में दो मत व्यक्त किये। कुछ लोगों का कथन है संसार मिथ्या है, कुछ लोगों का कथन है संसार सत्य है। उन सबके प्रमाण भी आपके सामने रखे गए थे। और ये बताया गया था कि दोनों ही मत सही है। और इसका संक्षेप ये है कि हमारे मन का बनाया हुआ संसार, वासनात्मक संसार, कामनात्मक संसार मिथ्या है किन्तु ईश्वर का बनाया हुआ स्थूल भौतिक जगत सत्य है। आज इसके आगे विचार करना है। सर्वप्रथम एक फिलोसॉफी समझ लीजिए। यदि भीतर का संसार समाप्त कर दिया जाए तो बाहर का संसार बाल बांका नहीं कर सकता। ये सिद्धांत है। यदि भीतर का संसार समाप्त हो जाए किसी प्रकार तो बाहर का संसार कुछ भी गड़बड़ नहीं कर सकता, थोड़ा भी नहीं। और इसका प्रमाण ये है कि आत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम, योगिन्द्र, अमलात्मा परमहंस, निर्ग्रंथ महापुरुष लोग इसी संसार में भगवतप्राप्ति के बाद रहते हैं, और उनका बाल बांका नहीं होता। सदा आनंदमय, ज्ञानमय स्थिति में रहते हैं। यद्यपि ये अज्ञान और माया की एक्टिंग करते हैं। इसका विशद विवेचन पहले ही किया जा चुका है। अतएव हमें अपने मानसिक संसार के मिटाने का ही प्रयत्न करना है। क्योंकि यदि वो मिट गया तो फिर बाहर का संसार कोई खतरा नहीं है। लेकिन इसका उल्टा भी समझ लीजिए। यदि बाहर का संसार मिट गया, मान लो। असंभव! अरे मान लो मिट गया किसी का। सब घर बार छोड़ करके, जंगल में आंख बंद करके, कान में रुई लगा करके कोई एक पेड़ के नीचे बैठ गया। अब तो बाहर का संसार समाप्त हो गया उसके लिए। अच्छा चलो मान लेते है। तो, इससे भीतर का संसार समाप्त नहीं हो सकता।
—जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज
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कलियुग में दान को ही कल्याण का एकमात्र माध्यम बताया गया है। 'दानमेकं कलौयुगे'।
दान पात्र के अनुसार ही अपना फल देता है तथा भगवान एवं महापुरुष के निमित्त किया गया दान सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करता है।
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