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गबन|मुंशी प्रेमचन्द|कक्षा 11 |Semester 2| Gaban Upanayas|Munshi Premchand| अध्याय 40to52 की व्याख्या

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गबन|मुंशी प्रेमचन्द|कक्षा 11 |Semester 2| Gaban Upanayas|Munshi Premchand| अध्याय 40to52 की व्याख्या

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गबन | मुंशी प्रेमचन्द | कक्षा 11 | Semester 2 | Gaban Upanayas | Munshi Premchand | अध्याय 40 to 52 की व्याख्या | wbchse | One Shot Easy Explanation + 📌Important Question Answers : मुंशी प्रेमचंद का संक्षिप्त जीवन परिचय हिन्दी उपन्यास और कहानी साहित्य को विकास की चरम सीमा तक पहुँचाने वाले मुंशी प्रेमचंद हिन्दी के महान् लेखक थे। इनका जन्म वाराणसी जनपद के लमही ग्राम में 31 जुलाई, 1880 ई० में हुआ था। इनकी मृत्यु 8 अक्टूबर, 1936 ई० में हुई। मुंशी प्रेमचंद कलम के सिपाही थे। इनकी लेखनी पूँजीवाद, शोषण और सामाजिक कुरीतियों से लड़ती रही। इनकी पहली रचना 'सोजेवतन' 1907 ई० में प्रकाशित हुई। यह उर्दू में लिखी गई थी। इसे अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया क्योंकि यह रचना राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत थी। यह रचना मुंशी प्रेमचंद के पहले नाम 'नवाब राय' के नाम से प्रकाशित हुई थी। इसके बाद ही वे मुंशी प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे। मुंशी प्रेमचंद का हिन्दी उपन्यास में आगमन एक युगान्तकारी घटना है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है 'मुंशी प्रेमचंद शताब्दियों से पद-दलित, अपमानित और उपेक्षित कृषकों की आवाज थे, पर्दे में कैद, पद-पद पर लांक्षित और असहाय नारी जाति की महिमा के जबरदस्त वकील थे, गरीबों के महत्व के प्रचारक थे। अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन- सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख, सूझ-बूझा जानना चाहते हैं तो मुंशी प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आप को दूसरा कोई नहीं मिल सकता। झोपड़ियों से लेकर महलों, खोमचेवालों से लेकर धारा-सभाओं तक आपको इतने कौशलपूर्ण और प्रामाणिक भाव से कोई नहीं ले जा सकता।' सत्य ही है मुंशी प्रेमचंद का साहित्य वर्तमान समाज का दर्पण है। मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ गोदान, गबन, सेवासदन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि (उपन्यास), मानसरोवर (कहानी संग्रह आठ भागों में), कायाकल्प, कर्वला (नाटक) है। मुंशी प्रेमचंद उन कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने साहित्य को महलों से निकाल कर झोपड़ियों तक पहुँचा दिया। गोबर, होरी, धनिया, माधव, घीसू और हल्कू का जीवन साहित्य का रूप बन गया। इस महान् कलाकार पर हिन्दी साहित्य युग-युग तक गर्व करता रहेगा। भूमिका : मान' मुंशी प्रेमचन्द द्वारा हिंदी में लिखित एक लोकप्रिय उपन्यास है, जिसे 1931 ई० में 'सरखती प्रेस' द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस उपन्यास के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद ने ब्रिटिश शासित भारतीय युवाओं के गिरते नैतिक मूल्यों को दिखाने की कोशिश किया है। इस उपन्यास में वर्णित है कि एक शिक्षित नवयुवक किस हद तक नैतिक रूप से नीचे गिर सकता है कि यह एक अमीर व्यक्ति के रूप में अपनी झूठी छवि के लिए छद्म और जालसाजी करता है। प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से बताने की पूरी कोशिश किया है कि हमारा मध्यमवर्गीय भारतीय समाज सोने के गहनों के लिए कर्ज के दलदल में फँस जाता है और उससे मुक्ति पाने के लिए किये गये उपाय बेकार साबित होते. हैं। चाहे उसके लिए स्वयं के घर में रखे स्त्री-धन के रूप में सोने के बने गहनों को चोरी करना पड़े या दफ्तर के रुपयों को गबन करना पड़े। प्रस्तुत उपन्यास 'गबन' का मुख्य पात्र रमानाथ एवं जालपा है जिनके सहारे कथानक शुरू से अंत तक दिलचस्प बना रहता है। इस उपन्यास के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज में विधवा के बेवशी को बड़ा ही मार्मिक ढंग, से वर्णन हुआ है। इस उपन्यास को ध्यान से पढ़ने पर पाठकों को ज्ञात होगा कि हमारे देश में परंपरानुसार विधवाओं को पति के न रहने पर उनके संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं मिलता था। इस उपन्यास के द्वारा इस तथ्य पर मुंशी प्रेमचंद प्रकाश डालते हैं कि तनावग्रस्त युवा जब कानून की पकड़ से बचने के लिए भागा फिरता है और जब उसे पुलिस शंका के आधार पर पकड़कर थाना ले जाती है तो यह अपने अपराध के लिए मिलनेवाले दण्ड से बचने के लिए पुलिस अफसरों के कहने पर एक डकैती के मामले में अदालत में झूठी शहादत (गवाही) देने के लिए मानसिक दबाव में आकर तैयार हो जाता है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र रमानाथ के झूठी गवाही से 12 लोगों को सजा होती है जिसमें से एक को फाँसी की सजा होती है। अपनी पत्नी जालपा के द्वारा जब उसे उसके भूल का एहसास कराया जाता है तब रमानाथ अदालत में अपनी गवाही को बदल देता है जिससे सभी अभियुक्त बरी हो जाते हैं। इस उपन्यास में मुंशी प्रेमचन्द ने स्पष्ट किया है कि स्त्रियों को शिक्षित किए बिना समाज में खुशहाली एवं समृद्धि का द्वार नहीं खुल सकता। इसके अलावा हमारा समाज जब तक नारी एवं पुरुषों के मेलजोल को शंका की दृष्टि से देखता रहेगा तबतक हम पिछड़ेपन के दौर से मुक्त नहीं हो सकते। मुंशी प्रेमचंद ने इसी उद्‌गार को अपने उपन्यास में बुजुर्ग अनुभवी वकील इन्दुभूषण एवं रमानाथ के बीच आपसी संवाद के द्वारा जीवंत रूप से वर्णित किया है। संक्षेप में इस उपन्यास के बारे में चर्चा करें तो यह समझ पायेंगे कि यह उपन्यास मानवीय संवेदना तथा सामाजिक रीति-रिवाज को सटीक ढंग से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि भारतीयों को औपनिवेशिक काल में विदेशी वस्तुओं से दूर रहने का अमर संदेश मिला है। गबन उपन्यास अध्याय 27 to 39 👇    • गबन|मुंशी प्रेमचन्द|कक्षा 11 |Semester 2| ...   #wbchse #class11 #gaban #munshipremchand #semester2 #newsyllabus #studywithsania #viralvideo #video #onlineeducation #education #easyexplaination #oneshot