Перейти к содержимому

Rath mela ranchi jharkhand | जगन्नाथपुर रथ मेला राँची | #rathyatra #Mela_video

Pradeep Solutions Centre

0:00 / 0:00

Rath mela ranchi jharkhand | जगन्नाथपुर रथ मेला राँची | #rathyatra #Mela_video

5 862 просмотра · 4 года назад
Pradeep Solutions Centre
31,2 тыс. подписчиков
5 862 просмотра · 4 года назад
#pradeep_solutions_centre #mela #rathyatra #ranchi #Jagannathpur #Jagannathpur mela ranchi 2022 Rath mela ranchi 2022 bhagwan Jagannath ki rath yatra Ranchi mela date - 01 July 2022 Jagannathpur mela ranchi 2022 | Rath mela ranchi | purani yaade रथ मेला रांची 2022 रांची रथ मेला ranchi Rathmela 2022 जगन्नाथपुर मेला रांची झारखण्ड रथ यात्रा रांची 2022 jagannathpur ranchi mela 2022 इस साल का जगन्नाथपुर मेला Jagannathpur mela this year Is saal ka rath mela ranchi jharkhand mela video मेला का वीडियो रथ यात्रा जगणनाथपुर राँची मेला वीडियो 2022 का मेला का वीडियो धुँवा मेला Mela k or video link se dekhe 1.    • Jagannathpur Rath mela ranchi jharkhand रा...   2.    • Jagannathpur  Rath mela ranchi jharkhand f...   3.    • Jagannathpur Rath mela Ranchi ( रांची. जगन...   4.    • Jagannathpur rath mela 2021 Ranchi jharkha...   रांची में रथ मेला का इतिहास : एनीनाथ शाहदेव ने 1691 में जगन्नाथपुर मंदिर का कराया था निर्माण झारखंड की राजधानी रांची का जगन्नाथपुर मंदिर पुरी की तरह ही रथ यात्रा के लिए प्रसिद्ध है. जगन्नाथपुर मंदिर के संस्थापक के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी लाल प्रवीर नाथ शाहदेव ने बताया कि 1691 में बड़कागढ़ में नागवंशी राजा ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने रांची में धुर्वा के पास भगवान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था. ठाकुर एनीनाथ शाहदेव अपने नौकर के साथ पुरी गये थे. नौकर भगवान का भक्त बन गया और कई दिनों तक उनकी उपासना की. एक रात्रि वह भूख से व्याकुल हो उठा. मन ही मन प्रार्थना की कि भगवान भूख मिटाइये. उसी रात भगवान जगन्नाथ ने रूप बदल कर अपनी भोगवाली थाली में खाना लाकर उसे खिलाया. रांची : झारखंड की राजधानी रांची का जगन्नाथपुर मंदिर पुरी की तरह ही रथ यात्रा के लिए प्रसिद्ध है. जगन्नाथपुर मंदिर के संस्थापक के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी लाल प्रवीर नाथ शाहदेव ने बताया कि 1691 में बड़कागढ़ में नागवंशी राजा ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने रांची में धुर्वा के पास भगवान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था. ठाकुर एनीनाथ शाहदेव अपने नौकर के साथ पुरी गये थे. नौकर भगवान का भक्त बन गया और कई दिनों तक उनकी उपासना की. एक रात्रि वह भूख से व्याकुल हो उठा. मन ही मन प्रार्थना की कि भगवान भूख मिटाइये. उसी रात भगवान जगन्नाथ ने रूप बदल कर अपनी भोगवाली थाली में खाना लाकर उसे खिलाया. नौकर ने पूरी आपबीती ठाकुर साहब को सुनायी. उसी रात भगवान ने ठाकुर को स्वप्न में कहा कि यहां से लौटकर मेरे विग्रह की स्थापना कर पूजा-अर्चना करो. पुरी से लौटने के बाद एनीनाथ ने पुरी मंदिर की तर्ज पर रांची में मंदिर की स्थापना की. लाल प्रवीर नाथ ने बताया कि मंदिर की स्थापना के साथ ही मानवीय मूल्यों की भी स्थापना कर समाज को जोड़ने के लिए हर वर्ग के लोगों को जिम्मेदारी दी गयी. उरांव परिवार को मंदिर की घंटी देने और तेल व भोग के लिए सामग्री देने की जिम्मेदारी दी गयी. आज भी बंधन उरांव और बिमल उरांव इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं. मुंडा परिवार को झंडा फहराने, पगड़ी देने और वार्षिक पूजा की व्यवस्था की जिम्मेवारी दी गयी. रजवार और अहीर जाति के लोगों को भगवान जगन्नाथ को मुख्य मंदिर से गर्भगृह तक ले जाने की जिम्मेवारी दी गयी. बढ़ई परिवार को रंग-रोगन की जिम्मेवारी दी गयी. लोहरा परिवार रथ की मम्मत करते हैं. कुम्हार परिवार मिट्टी के बरतन की व्यवस्था करते हैं. रांची : झारखंड की राजधानी रांची का जगन्नाथपुर मंदिर पुरी की तरह ही रथ यात्रा के लिए प्रसिद्ध है. जगन्नाथपुर मंदिर के संस्थापक के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी लाल प्रवीर नाथ शाहदेव ने बताया कि 1691 में बड़कागढ़ में नागवंशी राजा ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने रांची में धुर्वा के पास भगवान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था. ठाकुर एनीनाथ शाहदेव अपने नौकर के साथ पुरी गये थे. नौकर भगवान का भक्त बन गया और कई दिनों तक उनकी उपासना की. एक रात्रि वह भूख से व्याकुल हो उठा. मन ही मन प्रार्थना की कि भगवान भूख मिटाइये. उसी रात भगवान जगन्नाथ ने रूप बदल कर अपनी भोगवाली थाली में खाना लाकर उसे खिलाया. नौकर ने पूरी आपबीती ठाकुर साहब को सुनायी. उसी रात भगवान ने ठाकुर को स्वप्न में कहा कि यहां से लौटकर मेरे विग्रह की स्थापना कर पूजा-अर्चना करो. पुरी से लौटने के बाद एनीनाथ ने पुरी मंदिर की तर्ज पर रांची में मंदिर की स्थापना की. लाल प्रवीर नाथ ने बताया कि मंदिर की स्थापना के साथ ही मानवीय मूल्यों की भी स्थापना कर समाज को जोड़ने के लिए हर वर्ग के लोगों को जिम्मेदारी दी गयी. उरांव परिवार को मंदिर की घंटी देने और तेल व भोग के लिए सामग्री देने की जिम्मेदारी दी गयी. आज भी बंधन उरांव और बिमल उरांव इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं. मुंडा परिवार को झंडा फहराने, पगड़ी देने और वार्षिक पूजा की व्यवस्था की जिम्मेवारी दी गयी. रजवार और अहीर जाति के लोगों को भगवान जगन्नाथ को मुख्य मंदिर से गर्भगृह तक ले जाने की जिम्मेवारी दी गयी. बढ़ई परिवार को रंग-रोगन की जिम्मेवारी दी गयी. लोहरा परिवार रथ की मम्मत करते हैं. कुम्हार परिवार मिट्टी के बरतन की व्यवस्था करते हैं.