कबीरा तेरी झोंपड़ी, गलकटियन के पास |Sant Kabir Ke Dohe | Soulful Bhakti Bhajan
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कबीरा तेरी झोंपड़ी, गलकटियन के पास |Sant Kabir Ke Dohe | Soulful Bhakti Bhajan
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भजन: माखी गुड़ में गड़ि रही
संत वाणी: कबीर साहेब
शैली: निर्गुण भजन | आध्यात्मिक लोक-भजन
भाव: आत्म-साक्षात्कार | भक्ति | ध्यान | आत्मज्ञान
चैनल: @FreeHumanssoul
Voice: Artificially Modulated
संत कबीर दास जी के अमर दोहे हमें कर्म, करुणा, अहिंसा और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाते हैं। इस भजन में कबीर दास जी बताते हैं कि हर व्यक्ति अपने कर्मों का फल स्वयं भोगता है, इसलिए दूसरों के अवगुणों को देखकर व्यथित होने के बजाय हमें अपने हृदय में दया, क्षमा और अहिंसा का भाव जाग्रत रखना चाहिए।
दोहे एवं सरल भावार्थ (Dohas & Meaning):
कबीरा तेरी झोंपड़ी, गलकटियन के पास। जो करेगा सो भरेगा, तू क्यों भया उदास॥
भावार्थ: आस-पास के बुरे लोगों या उनके दुष्कर्मों को देखकर दुखी मत हो, क्योंकि जो जैसा कर्म करेगा, वह वैसा ही फल भोगेगा।
साईं के सब जीव हैं, दया धर्म मन धार...
भावार्थ: संसार के सभी जीव उसी एक परमात्मा के हैं, इसलिए अपने मन में सदैव दया और धर्म का भाव बनाए रखो।
कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ॥
भावार्थ: आत्म-ज्ञान के मार्ग पर वही चल सकता है, जो अपने अहंकार और सांसारिक मोह-माया को भस्म करने का साहस रखता हो।
पीर सबन को एकसी, मूरख जानैं नाहिं। अपना गला कटाय कै, भिश्त बसै क्यों नाहिं॥
भावार्थ: दर्द सभी जीवों को एक समान होता है जिसे अज्ञानी नहीं समझ पाते; यदि किसी जीव की हत्या से स्वर्ग मिलता, तो हत्यारा स्वयं अपना गला क्यों नहीं कटवा लेता?
बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल। जो नर बकरी खात हैं, तिनका कौन हवाल॥
भावार्थ: केवल सूखी पत्तियाँ खाने वाली निर्दोष बकरी की खाल खींच ली जाती है, तो सोचिए जो मनुष्य उस बकरी का मांस खाते हैं उनका आगे क्या हाल होगा।
मांस मांस सब एक है, मुरगी हिरनी गाय। आँख देख जे खात हैं, ते नर नरकहि जाय॥
किसी भी जीव का मांस एक समान ही है; सब कुछ जानते-बूझते हुए भी जो दूसरों की हत्या कर मांस खाते हैं, वे घोर कष्ट के भागी बनते हैं।
दया दिल में राखिये, तू क्यों निरदयी होय। साईं के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय॥
अपने मन में निर्दयता त्यागकर दया भाव रखें, क्योंकि चींटी से लेकर हाथी तक सभी जीव एक ही ईश्वर की संतान हैं।
भावार्थ: पशु-पक्षी अज्ञानतावश एक-दूसरे को खाते हैं, परंतु सच्चे साधक कभी मांस का सेवन नहीं करते; वे सभी को जीने देते हैं और प्रभु भक्ति में लीन रहते हैं।
जो लोग मांस, मछली और मदिरा में लिप्त रहते हैं, उनका पतन उसी तरह तय है जैसे खेत से मूली उखाड़ ली जाती है।
जीवों की हिंसा करना प्रत्यक्ष पाप है; कोई भी सच्चा धर्मग्रंथ यह नहीं कहता कि किसी बेजुबान की जान लेकर कोई स्वर्ग जा सकता है।
किसी एक पर दया और दूसरे पर क्रूरता कैसा न्याय है? चाहे छोटी चींटी हो या विशाल हाथी, सभी उसी प्रभु के स्वरूप हैं।
भावार्थ: जहाँ करुणा है वहीं सच्चा धर्म है, लोभ और क्रोध केवल पाप को जन्म देते हैं; और जहाँ क्षमा का भाव है, वहाँ साक्षात ईश्वर का वास होता है।
मांस और नशे का त्याग कर सभी जीवों पर दया करो; कबीर कहते हैं कि वास्तव में उत्तम वही मनुष्य है जिसका अंतःकरण और प्राण पूरी तरह पवित्र हैं।
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