@कुम्हारा रे.......
mona Lall
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@कुम्हारा रे.......
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mona Lall
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जन्म बदलते रहे, रूप बदलते रहे—पर गढ़ने वाला वही रहा।
“कुम्हारा रे” उस अनदेखे कुम्हार की पुकार है, जो जन्म-जन्मांतर से इस मिट्टी को नए रूप में ढालता आया है। कभी सँवारता है, कभी मिटाकर फिर रचता है—और हर आकार में अपनी ही छाप छोड़ जाता है।
हम पात्र बदलते रहे, वह सृजन करता रहा।
अमरदीप की ओर से एक संगीतमय भेंट।
क्या आपको भी कभी लगा है कि कोई अदृश्य हाथ आपके जीवन को आकार दे रहा है? अपने भाव टिप्पणियों में साझा करें।
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