उत्तराखंड में आने वाली है नए निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़, पर फायदा किसके लिए और नुकसान किसका?
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उत्तराखंड में आने वाली है नए निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़, पर फायदा किसके लिए और नुकसान किसका?
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खबर है कि, उत्तराखंड में अब विश्वविद्यालय खोलना आसान होने जा रहा है…
लेकिन सवाल ये है कि आसान किसके लिए और फायदा किसका?
अभी तक मैदानी इलाके में निजी विश्वविद्यालय खोलने के लिए 10 एकड़ और पहाड़ी क्षेत्रों में ढाई एकड़ जमीन की जरूरत होती है।
लेकिन अब सरकार जमीन की शर्त को आसान करने की तैयारी में है।
मैदानी इलाकों में करीब 20 हजार वर्गमीटर और पहाड़ों में करीब 2500 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र का मानक रखने की बात हो रही है।
निजी विश्वविद्यालय बनाना गलत नहीं है।
निजी निवेश से विश्वविद्यालय बढ़ें, सीटें बढ़ें, नए courses आएं, research बढ़े—यह अच्छी बात है।
लेकिन नियमों को आसान बनाना और मानकों को कमजोर करना दो अलग बातें हैं।
सरकार अगर जमीन का मानक बदलती है तो साथ में उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि—
इंफ्रास्ट्रक्चर का न्यूनतम स्तर क्या होगा?
कितने शिक्षक अनिवार्य होंगे?
लाइब्रेरी और लैब के क्या मानक होंगे?
छात्रों से कितनी फीस ली जा सकेगी?
अतिरिक्त शुल्क पर निगरानी कौन करेगा?
और सबसे जरूरी—
अगर कोई निजी विश्वविद्यालय मानकों पर खरा नहीं उतरता तो कार्रवाई कौन करेगा?
क्योंकि विश्वविद्यालय खोलने की प्रक्रिया आसान करना अच्छी बात हो सकती है…
लेकिन अगर इसी आसानी में गुणवत्ता मुश्किल हो गई, तो फिर नुकसान किसी बिल्डर या संस्था का नहीं होगा।
नुकसान होगा उस छात्र का…
जो अपने मां-बाप की जिंदगी भर की कमाई लगाकर वहां पढ़ने पहुंचेगा।
इसलिए
सवाल ये नहीं है कि उत्तराखंड में कितनी नई यूनिवर्सिटीज खुलेंगी।
सवाल ये है कि—
उन यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई कितनी होगी और फीस के बदले छात्र को मिलेगा कितना?
कहीं ऐसा न हो कि…
जमीन कम हो गई, बिल्डिंग खड़ी हो गई, बोर्ड चमक गया…
लेकिन शिक्षा कहीं पीछे छूट गई।
फैसला सरकार को करना है—
उत्तराखंड को ज्यादा विश्वविद्यालय चाहिए…
या ज्यादा अच्छे विश्वविद्यालय?
और दोनों में फर्क सिर्फ जमीन का नहीं है।
फर्क नीयत, निगरानी और मानकों का है।
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