Maa Lalita Devi Mandir Naimisharanya Dhaam
Lalita devi mandir13
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ललिता देवी मंदिर:
भक्तों ललिता देवी मंदिर नैमिषारण्य धाम का प्रमुख मंदिर है। इस मंदिर को शक्तिपीठ मान्यता प्राप्त है। क्योंकि यहां माता सती का हृदय गिरा था। इस मंदिर में साल भर भक्तो का तांता लगा रहता है, ललिता देवी का मंदिर बहुत पुराना मंदिर है कुछ लोग इस ललिता देवी मन्दिर को लिंगधारिणी मंदिर भी कहते है, इस मन्दिर का आधार काफी सुन्दर बना हुआ है। इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि जब देवताओं और दैत्यों का युद्ध हुआ। उस युद्ध में देवता, दैत्यों से पराजित हो गए। तब उन्होंने ब्रह्मा जी से अपनी रक्षा की गुहार लगाई। ब्रह्मा जी ने देवताओं को देवी की आराधना करने का आदेश दिया। ब्रह्मा जी के आदेश पर देवताओं ने यहाँ 80 वर्षों तक यज्ञ अनुष्ठान करते हुए माँ से प्रकट होकर असुरों का विनाश करने की प्रार्थना की। देवताओं के आग्रह को स्वीकार कर वहां ललिता देवी प्रकट हुई और दैत्यों का संहार किया। तत्पश्चात देवताओं ने माँ से यहीं निवास करने का निवेदन किया। देवताओं के आग्रह का ही परिणाम है कि माँ ललिता आज भी यहां विराजमान होकर अपने भक्तों कल्याण कर रही हैं।
दधीचि की तपस्थली:
भक्तों नैमिषारण्य की तपो भूमि पर ही ऋषि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियां देवताओं को दान में दी थीं। उन्ही अस्थियों से बने वज्र से देवराज इंद्र ने अत्यंत अत्याचारी राक्षस वृतासुर का वध करने में सफलता पाई थी थी।
पंचप्रयाग सरोवर:
भक्तों नैमिषारण्य तीर्थ में ललिता मंदिर के समीप ही एक छोटा सा पवित्र कुंड है। इस पवित्र कुंड को पंचप्रयाग सरोवर कहा जाता है। श्रद्धालु गण इस पवित्र कुंड के जल में स्नान और आचमन करते है। पञ्चप्रयाग सरोवर के अक्षयवट नाम का एक वटवृक्ष हैं बताया जाता कि ये वटवृक्ष पांच हजार निन्न्यानवे वर्ष पुराना है। माना जाता है कि जो इस पेड़ के नीचे योग करता है वह असाध्य रोग से छुटकारा पा सकता है।
अट्ठासी हज़ार ऋषियों की तपस्थली और यज्ञस्थली:
भक्तों व्यास गद्दी के पास ही अट्ठासी हजार ऋषियों की तपस्थली है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात ऋषि मुनि कलियुग के कलुष और दुष्प्रभावों से चिंतित होकर शौनक जी के साथ 88 हजार ऋषियो ने इसी स्थान पर तप किया था। और शौनक जी के आग्रह पर जहाँ महर्षि लोमहर्षण जी के सुपुत्र परम तपस्वी सौति उग्रश्रवा अर्थात सूत जी ने अट्ठासी हजार ऋषियों को अष्टादश पुराणों की कथा सुनाई थी।
छोटी परिक्रमा:
भक्तों यदि कोई श्रद्धालु 84 कोस की परिक्रमा करने में सक्षम नहीं होता है तो वह सवा कोस की परिक्रमा कर, परिक्रमा का भी पूरा फल प्राप्त कर सकता है। छोटी परिक्रमा में चक्रतीर्थ, भूतेश्वरनाथ, सूतगद्दी, श्रीपरमहंस, क्षेमकाया, भगवती देवी, ललिता देवी, पंच-प्रयाग, जानकी कुण्ड, काशी तीर्थ, अन्नपूर्णा, विश्वनाथ, चित्रगुप्त, सप्तर्षिटीला, व्यास गद्दी, मनु शतरूपा स्थल, वल्लभाचर्यजी की बैठक, ब्रह्म, गंगोत्री पुष्कर, दशाश्वमेध घाट, हनुमान गढ़ी, पञ्च पाण्डव, यज्ञवराह कूप, नरसिंह मंदिर, रामानुज कोट और जगन्नाथ मंदिर आदि स्थलों के दर्शन होते हैं।
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