bhooli malini hai eyo satguru jagta hai deo @radhakeshabad
Radha Ke Shabad
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आसा स्री कबीर जीउ के पंचपदे ९ दुतुके ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पाती तोरै मालिनी पाती पाती जीउ ॥ जिसु पाहन कउ पाती तोरै सो पाहन निरजीउ ॥१॥
पद्अर्थ: पाती = पत्र, पत्ती। पाती पाती = हरेक पत्र में। जीउ = जीवन। पाहन = पत्थर। निरजीउ = निर्जीव।1।
अर्थ: (मूर्ति के आगे भेटा धरने के लिए) मालिनि पत्तियां तोड़ती है, (पर ये नहीं जानती कि) हरेक पत्ती में जीव है। जिस पत्थर (की मूर्ति) की खातिर (मालनि) पत्तियां तोड़ती है, वह पत्थर (की मूर्ती) निर्जीव है।1।
भूली मालनी है एउ ॥ सतिगुरु जागता है देउ ॥१॥ रहाउ॥
पद्अर्थ: एउ = इस तरह।1। रहाउ।
अर्थ: (ये निर्जीव मूर्ति की सेवा करके) इस तरह (ये) मालनि भूल रही है, (असली ईष्ट) सतिगुरु तो (जीता) जागता देवता है।1। रहाउ।
ब्रहमु पाती बिसनु डारी फूल संकरदेउ ॥ तीनि देव प्रतखि तोरहि करहि किस की सेउ ॥२॥
पद्अर्थ: ब्रहमु = ब्रहमा। डारी = डाली, टहनी। संकर = शिव। प्रतखि = प्रत्यक्ष, सामने। तोरहि = तोड़ रही है। सेउ = सेवा।2।
अर्थ: (हे मालिनि!) पत्तियां ब्रहमा रूप हैं, डाली विष्णु रूप
और फूल शिव रूप। इन तीनों देवताओं को तो तू अपने सामने ही नाश कर रही है, (फिर) सेवा किस की करती है?।2।
पाखान गढि कै मूरति कीन्ही दे कै छाती पाउ ॥ जे एह मूरति साची है तउ गड़्हणहारे खाउ ॥३॥
पद्अर्थ: पाखान = पत्थर। गढि कै = घड़ के। पाउ = पाँव, पैर।3।
अर्थ: (मूर्ति घड़ने वाले ने) पत्थर घड़ के, और (घड़ने के समय मूर्ति की) छाती पर पैर रख कर मूर्ति तैयार की है। अगर ये मूर्ति असल देवता है तो (इस निरादरी के कारण) बनाने वाले को ही खा जाती।3।
भातु पहिति अरु लापसी करकरा कासारु ॥ भोगनहारे भोगिआ इसु मूरति के मुख छारु ॥४॥
पद्अर्थ: भातु = चावल। पहिति = दाल। लापसी = पतला कड़ाह। करकरा कासारु = खस्ता पंजीरी। छारु = राख। मुखि छारु = मुंह में राख; भाव, कुछ ना मिला।4।
अर्थ: चावल, दाल, हलवा और करकरी पंजीरी तो खाने वाला (पुजारी ही) खा जाता है, इस मूर्ति के मुंह में कुछ भी नहीं पड़ता (क्योंकि ये तो निर्जीव है, खाए कैसे?)।4।
मालिनि भूली जगु भुलाना हम भुलाने नाहि ॥ कहु कबीर हम राम राखे क्रिपा करि हरि राइ ॥५॥१॥१४॥
पद्अर्थ: क्रिपा करि = कृपा करके। राखे = रख लिया है, भुलेखे से बचा लिया है।5।
अर्थ: हे कबीर! कह: मालिनि (मूर्ति पूजने के) भुलेखे में पड़ी हुई है, जगत भी यही गलती कर रहा है, पर हमने ये भुलेखा नहीं खाया, क्योंकि परमात्मा ने अपनी मेहर करके हमें इस गलती से बचा लिया है।5।1।14।