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गीता अध्याय 5 श्लोक 3 | सच्चा संन्यासी कौन? श्रीकृष्ण की जीवन बदलने वाली सीख | Gita 700

Amar Prerna

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गीता अध्याय 5 श्लोक 3 | सच्चा संन्यासी कौन? श्रीकृष्ण की जीवन बदलने वाली सीख | Gita 700

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 3 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी कौन है। क्या संन्यास का अर्थ संसार और अपने कर्तव्यों को छोड़ देना है, या मन से द्वेष और इच्छाओं की आसक्ति को त्यागना ही वास्तविक संन्यास है? 📖 मूल श्लोक — भगवद्गीता 5.3 ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥ 5.3॥ सरल अर्थ: हे महाबाहो अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की अनावश्यक आकांक्षा में बँधता है, उसे सदा संन्यासी समझना चाहिए। ऐसा व्यक्ति द्वन्द्वों से मुक्त होकर सहज ही बंधन से मुक्त हो जाता है। 🙏 इस श्लोक से जानिए कि क्रोध, द्वेष, अपेक्षा और आसक्ति से मुक्त होकर जीवन में शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है। गीता 700 — जीवन परिवर्तन अभियान के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं को समझें और अपने जीवन में उतारें। ▶️ YouTube चैनल: Amar Prerna 📘 Facebook पेज: Amar Nath Amar Prerna वीडियो पसंद आए तो Like, Share, Subscribe करें और टिप्पणी में लिखें—“सच्चा त्याग मन के द्वेष और आसक्ति का त्याग है।” #BhagavadGita #GitaChapter5 #GitaShlok #GitaShlok5 #KrishnaVani #SanyasYoga #KarmaYoga #BhagavadGitaHindi #Gita700 #जीवनपरिवर्तनअभियान #श्रीमद्भगवद्गीता #AmarPrerna