हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में मूर्छना का सरल परिचय | Moorchana in Hindustani Music”
Sur Bharti
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🎵 मूर्छना क्या है? | हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में मूर्छना का सरल परिचय 🎶
इस वीडियो में हम मूर्छना (Moorchana) के बारे में सरल और आसान भाषा में समझेंगे। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विद्यार्थियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक विषय है।
इस वीडियो में जानिए:
✨ मूर्छना की परिभाषा
✨ मूर्छना का संगीत में महत्व
✨ स्वरों के क्रम और मूर्छना का संबंध
✨ मूर्छना को उदाहरण के साथ समझने का सरल तरीका
✨ शास्त्रीय संगीत की पढ़ाई में मूर्छना का उपयोग
अगर आप हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, संगीत शास्त्र और स्वर ज्ञान सीख रहे हैं, तो यह आपके लिए उपयोगी रहेगा।
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Notes-
।।मूर्च्छना।।
"मूर्च्छना" शब्द "मूर्छ" धातु से निकला है, जिसका अर्थ है चमकना या उभरना,इसलिए मूर्च्छना का अर्थ है चमकती हुई या उभरती हुई वस्तु।पं.ओंकारनाथ ठाकुर ने कहा कि "चमकीली या उभरती हुई वस्तु मूर्च्छना कहलाती है।"
भरत मुनि और पं. शारंगदेव जी ने कहा कि "सात स्वरों का क्रमानुसार आरोह-अवरोह करना, मूर्च्छना कहलाता है।"
मूर्च्छना के लक्षण:
(1) मूर्च्छना ग्राम-आश्रित होती है।
(2) मूर्च्छना में स्वर क्रमबद्ध होते हैं।
(3) मूर्च्छना सम्पूर्ण होती है।
(4) ग्राम के किसी भी विशेष स्वर से मूर्च्छना शुरू होती है।
आरोह-अवरोह और मूर्च्छना में अंतर:
दोनों बहुत अलग हैं। हर मूर्च्छना में श्रुति अंतर बदलता है।लेकिन आरोह-अवरोह में श्रुति अंतर सदा एक होता है ।
पुराने लेखकों ने श्रुति से स्वर, स्वर से ग्राम और ग्राम से मूर्च्छना का जन्म बताया है। हर ग्राम में 7–7 मूर्च्छनाएं हैं। ग्राम तीन हैं:
(1) षडज ग्राम मूर्च्छनाएं:
(1) उत्तर मन्द्रा, (2) रजनी, (3) उत्रायता, (4) शुद्ध षडजा, (5) मत्सरीकृता, (6) अश्वक्रांता, (7) अभिरुद्गता।
(2) मध्यम ग्राम मूर्च्छनाएं:
(1) सौवीरी, (2) हरिणाश्वा, (3) कलोपनता, (4) शुद्धमध्यमा, (5) मार्गी, (6) पौरवी, (7) हरिश्का
(3) गंधार ग्राम मूर्च्छनाएं:
भरत मुनि से पहले ही गंधर्वों के चले जाने से, गंधार ग्राम का आलोप हो गया था, इसलिए उनके नाम नहीं मिलते।
पं.शारंगदेव जी ने चार प्रकार की मूर्च्छनाएँ बताई हैं:-
(1) शुद्धा, (2) अंतर संहिता, (3) काकली संहिता, (4) अंतर काकली संहिता
आधुनिक युग में मूर्च्छना का कोई प्रचार नहीं होता, क्योंकि हर राग का आधार 'सा' स्वर को ही माना जाता है। लेकिन दक्षिण भारतीय संगीत में मूर्च्छना अभी भी प्रयोग की जाती है।