लोक साहित्य के प्रमुख रूप
साहित्यिक झरोखा
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लोक साहित्य किसी भी समाज की सामूहिक चेतना, जीवनानुभव, परंपराओं, विश्वासों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक स्मृतियों का साहित्यिक रूप है। यह किसी एक लेखक की रचना न होकर सामान्यतः लोकसमुदाय की सामूहिक सृजनशीलता का परिणाम होता है। लोक साहित्य का निर्माण और विकास मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से हुआ है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह गीतों, कथाओं, गाथाओं, कहावतों, पहेलियों, नाट्यों आदि के रूप में पहुँचता रहा है।
लोक साहित्य में लोकजीवन का सुख-दुःख, प्रेम-विरह, संघर्ष, आस्था, उत्सव, प्रकृति, पारिवारिक संबंध तथा सामाजिक अनुभव सहज रूप में अभिव्यक्त होते हैं। इसलिए लोक साहित्य को लोकसंस्कृति का दर्पण कहा जा सकता है।
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