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Chhabi Nidhi Rasa Nidhi Prem Sudha Nidhi, Radhe Shri Vrishbhanu Dular | Kripaluji Maharaj Bhajan

Radha Krishna Mandir Cuttack

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Chhabi Nidhi Rasa Nidhi Prem Sudha Nidhi, Radhe Shri Vrishbhanu Dular | Kripaluji Maharaj Bhajan

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Radha Krishna Mandir Cuttack
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Written and Composed by Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj Prem Ras Madira - Rasiya Madhuri छवि-निधि रस-निधि प्रेम-सुधा-निधि, राधे श्रीवृषभानुदुलार ॥ ह्लादिनि-शक्ति परमसुखखानी । ताको सारहि 'प्रेम' बखानी | प्रेम सार राधा ठकुरानी। महाभाव रूपिणि जु नवेली, अलबेली सरकार ॥१॥ (श्रीवृषभानुनन्दिनी राधिकाजी रूपरस एवं प्रेमसुधा की निधिस्वरूपा हैं। ह्लादिनी-शक्ति (आनन्द-ब्रह्मको सारभूता शक्ति) परमसुख की खान हैं। उस ह्लादिनी शक्ति के ही सार को महापुरुषों ने प्रेम कहा है, एवं उसी प्रेम की सारभूता शक्ति ठकुरानी राधिका हैं । उनको महाभाव स्वरूपिणी भी कहते हैं ।।१।।) मणिमय कनक-मुकुट सिर सोहै । चारु-चंद्रिका-छवि मन मोहै । तापर लर वरमुक्तन को है। कारी, अनियारी, घुघरारी, वेणी कुसुम-संवार ॥२॥ (श्रीराधिकाजी के सिर पर मणियों से जटित स्वर्ण का मुकुट सुशोभित हो रहा है, एवं मनोहर चन्द्रिका बर बस मन को मोहित करने वाली है। उस चन्द्रिका के ऊपर मोतियों की लड़ें क्या ही शोभा देती हैं। फूलों से सजाई हुई बेणी के बाल अत्यन्त ही काले, घने एवं घुँघराले हैं ।।२।।) श्रुति-ताटंक मकर-मन-हारी। लजत काम-धनु लखि भौं-प्यारी। सुधा-गरल-मधुमय दृग वारी। खंजन-मृग-चोर-मद-गंजन, अंजन मन-रिझवार ॥३॥ (कानों में मकर के मन को भी मोहित करने वाले मनोहर झुमके झूम रहे हैं, एवं उनकी प्यारी भौंहों को देखकर कामदेव का धनुष भी लज्जित हो रहा है । उनकी आँखें अमृत, विष, एवं मदिरा के गुणों से युक्त हैं, एवं अंजन से युक्त वे आंखें खंजन, हिरन तथा चकोर के भी अभिमान को चूर्ण करनेवाली हैं तथा रसिकों को आनन्द देनेवाली हैं ।।३।। ) झलमलात मुक्ताहल नासा। वदन-विकास मंजु-मधु-हासा ॥ वदन-सदन विधु-रदनन वासा । कर चूरी-करपत्र, मूदरिन-अंगुरिन सुघर सुधार ॥४॥ (उनकी नासिका पर झलमलाता हुआ मुक्ताहल सुशोभित हो रहा है । उनके सुन्दर मुख की शोभा मंद मधुर मुसकान से और भी बढ़ गई है । उनके मुखरूपी गृह में मानों दांत रूपी अनेकों चन्द्रमा निवास करते हैं । उनके हाथों में चूड़ी, करपत्र (पतरा) एवं अंगुलियों में मनोहर अंगूठियाँ शोभा दे रही हैं ।।४।। ) कंचुकि उर विलसित नव-रंगी। हार-मणिन-मोतिन बहुरंगी । त्रिबलि-नाभि-सर कटि-तन्वंगी। पृथु-नितम्ब, परिधान-नीलपट, चूनरि जरिन-किनार ॥५॥ (उनके वक्षस्थल पर अति सुन्दर रंग की चोली अलंकृत है । गले में विविध प्रकार के रङ्गवाले मणियों एवं मोतियों के हार सुशोभित हो रहे हैं । गहरे तालाब की तरह नाभि है एवं पेट में तीन बलियाँ पड़ी हुई हैं । कमर पतली है, कमर का निचला भाग मोटा है, नीलाम्बर पहिने हुए हैं । उनकी चुंदरी में जरीके काम की किनारी लगी हुई है ।।५।। ) रतन-जटित पग-पायल सोहिनि । चाल मरालन को मन-मोहिनि । लखि लजात शत-रति-पति-रोहिनि। आयो देखि 'कृपालु' दीन को, आदर येहि दरबार ॥६॥ (पैरों में अनेक प्रकार के रत्नों से जटित पायल शोभा दे रही है । इनकी चाल राजहंसों के मन को मोहित करने वाली है, तथा जिसको देखकर सैकड़ों कामदेव एवं चन्द्रमा लज्जित हो रहे हैं । “कृपालु" कहते हैं कि ऐसी रूपशृङ्गाररस-सुधा-माधुरी वृषभानुनन्दिनी के दरबार में शरणागत दीनों का सदा ही आदर होता है, ऐसा मैं अनुभव कर के आया हूँ॥६॥ )