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Mandukaya Upnishad 25 Shankar Bhashya Vaithatya Prakran 5 स्वयंप्रकाश आत्मा का स्वरूप

vedpuranupnishad

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Mandukaya Upnishad 25 Shankar Bhashya Vaithatya Prakran 5 स्वयंप्रकाश आत्मा का स्वरूप

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जाग्रत और स्वपन का मिथ्यात्व और स्वयंप्रकाश आत्मा का स्वरूप #mandukyaupanishad #upnishad #shankarachrya #awaits #adishankaracharya #adishankar #swyamprakash #आत्मा #Mandukaya Mandukaya Upnishad 25 Shankar Bhashya Vaithatya Prakran 5 #Vedanta #Advaita #Hinduism #NonDualism #Oneness #Nonduality #Spirituality #consciousness #Mandukya #upanishads मांडूक्य उपनिषद#शांकरभाष्य#आगम प्रकरण 12#संस्कृत हिंदी#sanskrit&hindi# Mandukya upnishad# AdiShankaracharya bhashya#(आत्मा के तीन पादों का वर्णन) आत्मा के चार पाद यानी भाग हैं जैसे एक रुपए के चार चवन्नी रूप चार भाग। 1. जाग्रत का अभिमानी विश्व 2. स्वप्न का अभिमानी तेजस 3. सुसुप्ति का अभिमानी प्राज्ञ 4. तूर्या (चतुर्य) माण्डूक्योपनिषद् अथर्ववेदीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इसमें कुल बारह मन्त्र हैं। कलेवरकी दृष्टिसे पहली दस उपनिषदोंमें यह सबसे छोटी है। किन्तु इसका महत्त्व किसीसे कम नहीं है। भगवान् गौडपादाचार्यने इसपर कारिकाएँ लिखकर इसका महत्त्व और भी बढ़ा दिया है। कारिका और शाङ्करभाष्यके सहित यह उपनिषद् अद्वैतसिद्धान्तरसिकोंके लिये परम आदरणीया हो गयी है। गौडपादीयकारिकाओंको अद्वैतसिद्धान्तका प्रथम निबन्ध कहा जा सकता है। इसी ग्रन्थरत्नके आधारपर भगवान् शङ्कराचार्यने अद्वैतमन्दिरकी स्थापना की थी। यों तो अद्वैतसिद्धान्त अनादि है, किन्तु उसे जो साम्प्रदायिक मतवादका रूप प्राप्त हुआ है उसका प्रधान श्रेय आचार्यप्रवर भगवान् शङ्करको है और उसका मूल ग्रन्थ गौडपादीयकारिका है। मांडूक्य उपनिषद का प्रधान विषय जीव (आत्मा) ब्रह्म(परमात्मा) का एकत्व स्थापित करके जगत का मायारूप से मिथ्या निरूपण किया है। इसी कारण इस सर्वोटकृष्ठ ब्रह्मविद्या रूपी सिद्धान्तको ग्रहण करनेके लिये बहुत ऊँचे अधिकारकी (साधन चतुष्ठय संपन्न अधिकारी की ) आवश्यकता है जो सब प्रकार साधनसम्पन्न हैं वे उच्चाधिकारी ही इसे ठीक-ठीक हृदयङ्गम कर सकते हैं। जिनके चित्त कुछ भी विषयप्रवण हैं वे इससे अधिक लाभ न उठा सकेंगे- इतना ही नहीं, अपितु उन्हें हानि होनेकी भी सम्भावना है। यह तत्त्व अत्यन्त दुर्बोध है-ऐसा तो स्वयं आचार्यचरणने ही कह दिया है 'दुर्दर्शमतिगम्भीरम्' । किन्तु जिस महाभाग महापुरुषकी दृष्टि इस परमतत्त्वतक पहुँच जाती है उसके लिये फिर कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता। वह स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है और दूसरे अधिकारी पुरुषोंको भी भवबन्धनसे मुक्त कर देता है। वह महामुनि सबका वन्दनीय है, सबका गुरु है और सभीका परम सुहृद् है। भगवान् हमें ऐसे महापुरुषोंके चरणकमलोंका आश्रय देकर हमारे संसारतापसन्तप्त अन्तःकरणोंको शान्ति प्रदान करें।