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श्री वसुपूज्य जिनेन्द्र निर्वाण स्तोत्रम् | चम्पापुर निर्वाण महिमा | भक्तिपूर्ण प्रस्तुति

Jinbhakt

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श्री वसुपूज्य जिनेन्द्र निर्वाण स्तोत्रम् | चम्पापुर निर्वाण महिमा | भक्तिपूर्ण प्रस्तुति

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🙏 जय जिनेन्द्र 🙏 भगवान श्री वसुपूज्य स्वामी, वर्तमान अवसर्पिणी के बारहवें तीर्थंकर, जैन धर्म के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखते हैं। चम्पापुर (वर्तमान भागलपुर, बिहार) उनकी जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण भूमि के रूप में परम पावन मानी जाती है। भगवान वसुपूज्य स्वामी ने सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के दिव्य संदेश से अनगिनत जीवों को मोक्षमार्ग की प्रेरणा प्रदान की। यह "श्री वसुपूज्य जिनेन्द्र निर्वाण स्तोत्रम्" उनके निर्वाण कल्याणक की महिमा, चम्पापुर सिद्धक्षेत्र की पवित्रता, कर्म-विनाश, आत्मशुद्धि तथा सिद्धत्व की परम उपलब्धि का भावपूर्ण स्तवन है। इस स्तोत्र के माध्यम से हम भगवान वसुपूज्य स्वामी के चरणों में श्रद्धा, भक्ति और कृतज्ञता अर्पित करते हैं। भगवान वसुपूज्य स्वामी का लाञ्छन महिष (भैंसा) है और उनका जीवन त्याग, तप, समता तथा मोक्षमार्ग का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करता है। 📜 Lyrics: श्रीमद्वसुपूज्यं जिनवर्यमीडे, चम्पापुरे प्राप्त-सुमोक्ष-मार्गम्। भाद्रस्य कृष्णे ह्युत्तर-फाल्गुन्याम्, निर्वाणलक्ष्मीं समवाप देवम्॥ मन्दार-पूज्यस्य सुतम् उदारम्, जयावती-गर्भात्-समुद्भूत-नाथम्। संसार-चक्रस्य विनाश-हेतुम्, वन्दे जिनं कर्म-विनाश-दक्षम्॥ महिष-लञ्छनेन सुशोभितांगम्, कनक-वर्णं धृत-शान्ति-रूपम्। ज्ञानाग्निना कर्म-वनं दहन्तम्, स्तौमि प्रभुं मुक्ति-पुरि प्रविष्टम्॥ सौधर्म-इन्द्रादि-सुरैः सुगीतम्, रत्नाभिषेकैश्च मखैः प्रसन्नाः। चम्पापुरे श्रेष्ठ-सुयोग-निधौ, मोक्षं गतं तं प्रणमामि नित्यम्॥ जय वसुपूज्यं जिनपुंगवं त्वाम्, निर्वाण-कल्याणक-पर्व-पूज्यम्। पापप्रणाशं कुरु मे जिनेन्द्र, नमामि भक्त्या शिवमार्ग-दातारम्॥ लोकाग्र-पार्श्वे कृत-वास-देवम्, अष्टौ च कर्माणि विनाश्य धीरम्। सिद्धं प्रबुद्धं परमात्म-रूपम्, ध्यायामि मन्ये ह्यमलं जिनेन्द्रम्॥ बाल-व्रती यः परम-प्रभावः, पञ्च-कल्याणक-प्राप्त-भूमिम्। चम्पापुरीं पावन-तीर्थ-रूपाम्, वन्दे सदा ज्ञान-दिवाकरं तम्॥ संसार-दुःखात् परिमोचनाय, पादाब्ज-सेवा तव देव कुर्वे। चम्पापुरे प्रापित-सर्व-सिद्धिम, श्रीवसुपूज्यं सततं नमामि॥ येन प्रणीतः परमः स्वभावः, हिंसा-विहीनः शम-भाव-युक्तः। धर्मो विशुद्धः शिव-हेतु-भूतः, तस्मै नमः श्रीवसुपूजिताय॥ रागं च द्वेषं मदनं च मोहम्, जित्वा महावीर-जिनेन्द्र-कल्पम्। मुक्तिं गतो यः परमं पदं च, तं देव-देवं सरसं नमामि॥ नमो जिनायाप्रतिम-प्रभाय, नमोस्तु ते मोक्ष-पुर-स्थिताय। नमोस्तु ते कर्म-विनाशकाय, नमो नमः शान्ति-कराण-हेतवे॥ तव प्रसादाद् मम पाप-नाशः, तव प्रसादाद् अमलं विशुद्धम्। लभ्याद् विशुद्धं जिन-भक्ति-रत्नम्, नमामि नित्यं वसुपूज्य-देवम्॥ चम्पापुरी-रत्नं त्रिभुवन-प्रदीपम्, मोक्ष-शिखरात् समुपागतं यम्। सिद्धालये तिष्ठति लब्ध-संज्ञम्, तं वसुपूज्यं हृदि भावयामि॥ स्वाहा-कृतं येन च कर्म-जालम्, ज्ञानात्मके ज्योतिषि दीप्यमाने। वन्दे महात्मानम् अमन्द-पुण्यम्, जिनेन्द्र-चन्द्रं शिव-सौख्य-दम्॥ तव पाद-पद्मं हृदि धारयामि, भवाब्धि-पारं गन्तुं दयाल। निर्वाण-दीप्त्या जगदुज्ज्वलं ते, नमो नमः श्रीवसुपूज्य-देव॥ सर्व-प्रकारैः परिपूर्ण-कामम्, संसार-पाशात् परिक्षीण-मोहम्। चम्पापुरे कृत-मोक्ष-लाभम्, वन्दे सदा वसुपूज्य-नाथम्॥ वासुपूज्यस्य पाद-युग्मं, सर्व-दुःख-विनाशनम्। मोक्ष-मार्ग-प्रकाशकञ्च, ध्यायामि हृदि सर्वदा॥ चम्पापुर-सुरम्य-तीर्थे, लब्ध-सिद्धिम अनुत्तमाम्। भक्त्या नमामि देवेशं, वासुपूज्यं जिनेश्वरम्॥ यस्य ध्यान-प्रभावेन, कर्म-बन्धाः प्रणाशिताः। स मया वासुपूज्याख्यः, पूज्यते सिद्ध-नायकः॥ अमलं केवलालोकं, दधानं शिव-मन्दिरम्। तं वन्दे वासुपूज्यञ्च, निर्वाण-पद-दायिनम्॥ मन्दार-सुत-पादाब्जे, भक्ति-नम्रेण चेतसा। अष्ट-द्रव्यैश्च सम्पूज्य, लभते परमं पदम्॥ जय जय वासुपूज्य त्वं, जगन्नाथ जिनेश्वर। कुरु मे मङ्गलं देव, सर्व-सम्पत्-प्रदायक॥ इति स्तोत्रम् इदं पुण्यं, वासुपूज्य-प्रकीर्तितम्। यः पठेत् सर्वदा भक्त्या, स लभेत् शाश्वतं पदम्॥ यदि यह भक्तिमय प्रस्तुति आपको पसंद आए तो वीडियो को LIKE, SHARE और COMMENT अवश्य करें तथा ऐसे ही जैन स्तोत्र, भजन, पूजन, कथा एवं धर्मप्रभावना से जुड़ी प्रस्तुतियों के लिए JinBhakt चैनल को SUBSCRIBE करें। #VasupujyaBhagwan #VasupujyaSwami #VasupujyaNirvan #NirvanKalyanak #JainStotra #JainBhakti #DigambarJain #Champapur #Jainism #JainDevotional #JinBhakt #Tirthankar #SiddhaBhakti #JainSongs #JainDharma