ईदगाह (Eidgaah) | हामिद का चिमटा | मानसरोवर भाग 1 | मुंशी प्रेमचंद
Yatharth Vani
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ईदगाह (Eidgaah) | हामिद का चिमटा | मानसरोवर भाग 1 | मुंशी प्रेमचंद
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'यथार्थ वाणी' (Yatharth Vani) - मानसरोवर भाग 1: ईदगाह
"खिलौनों की कीमत से कहीं बढ़कर होती है अपनों की फ़िक्र।"
मानसरोवर भाग 1 की इस कड़ी में हम लेकर आए हैं मुंशी प्रेमचंद जी की शायद सबसे प्रसिद्ध और दिल को छू लेने वाली कहानी— 'ईदगाह'। यह कहानी है एक छोटे से अनाथ बच्चे हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना की। ईद के मेले में जहाँ बाकी बच्चे मिठाइयाँ और मिट्टी के खिलौने खरीद रहे होते हैं, वहीं नन्हा हामिद अपनी दादी के लिए एक लोहे का चिमटा खरीदता है, ताकि रोटियाँ सेंकते समय उनकी उँगलियाँ न जलें।
यह कहानी बचपन की मासूमियत, गरीबी के दर्द और समय से पहले आई समझदारी का एक ऐसा मार्मिक चित्रण है, जो किसी की भी आँखें नम कर सकता है।
आइए सुनते हैं प्रेमचंद की इस अमर रचना को।
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अगर हामिद के इस निस्वार्थ प्रेम ने आपके दिल को छुआ हो, तो वीडियो को लाइक करें और कमेंट्स में बताएं कि आपको कहानी का कौन सा हिस्सा सबसे अच्छा लगा। 'यथार्थ वाणी' के साथ इस साहित्यिक यात्रा में जुड़े रहने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।
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