Jagannath Aarti | जय जगन्नाथ जगदाधार नमोऽस्तु ते | Powerful Sanskrit Aarti with 20 Verses
Bhakti Song by AI
0:00 / 0:00
Jagannath Aarti | जय जगन्नाथ जगदाधार नमोऽस्तु ते | Powerful Sanskrit Aarti with 20 Verses
163 просмотра · 11 мес. назад
Bhakti Song by AI
272 подписчика
163 просмотра · 11 мес. назад
Lyrics:
[Chorus]
जय जगन्नाथ जगदाधार नमोऽस्तु ते।
विष्णोः रूपाय करुणानिधये नमः॥
[Verse 1]
वृहन्नयननयनैर्भूयो भूयोऽभिगृह्णीषे।
दत्तदृशे दारिद्रदुःखहार करुणावत्सले॥
[Verse 2]
निलाद्रिनिवासनाथ रथयात्रारुचिराङ्घ्रे।
लोकसौख्यप्रदायक नमोऽस्तु मन्मथे हरि॥
[Verse 3]
गोपवर्धनवन्द्यं गोविन्दं रसमान्वितम्।
नित्यमरविन्दमुखं भजेम परमेश्वरम्॥
[Verse 4]
बलभद्रसहितांभोज सुभद्राप्रीतिमयो यः।
त्रिकूटस्थो जगन्नाथः सर्वभूतहितकरः॥
[Verse 5]
नित्यलीलासम्पन्नो रासरचितविभूषितः।
व्रजनन्दनवपुषा वत्सल्येन महोहति॥
[Verse 6]
दारुशिल्पविक्षेपेण दिव्यं रूपं समुत्पत्।
नरान्कारुण्यदीप्तान् हृदयान् विनि-शोभयन्॥
[Verse 7]
मोहविनाशकं शरणं मुमुक्षुसर्वलोकहितम्।
जगन्मित्रं जगन्नाथं पश्यन्ति सर्वे हृदयतः॥
[Verse 8]
रथेन्द्रियसमायुक्तो रथानुगो जनार्दनः।
हर्षेण हृदि गृह्णीयात् भक्तोर्नूनमनुत्तमः॥
[Verse 9]
निस्वार्थं ददाति भक्षणं दानं च साधुभक्ता।
सर्वक्लेशविनाशकं चरणौ सदा नमाम्यहम्॥
[Verse 10]
सागरतीरे स्थिता तीर्थनागे नीलवस्त्रधा।
निलाद्र्यन्तर्गतः श्रीः पालय दूरस्थानिकान्॥
[Verse 11]
त्रिलोकेशो निरीहः प्रणवविभूषितः।
भवसागरनायकः भक्तोपदेशप्रदः सदैव॥
[Verse 12]
विक्षिप्तनयनसौम्यं हिरण्यश्लोकभूषणम्।
वश्यंकरं नटराजं नित्यं संसृजति भक्तान्॥
[Verse 13]
कण्ठे मृदुहासान्नं पितृवत्सलमूर्तये।
इदं जगत्पितुर्भवति सदा भक्तानुग्रहः प्रभुः॥
[Verse 14]
रुत्सर्गे रथसमागमे रोदसि जननायक।
प्रीत्यर्थं पुण्यदानं करोति त्वां सदा वत्सलम्॥
[Verse 15]
दोषाक्षमक्षय्यस्ते दैवकल्याणोपदर्शकः।
यः समरभजन्त्वाम् तं सर्वकाशेऽपि विजहाति॥
[Verse 16]
गोपीनन्दनगुणैः सह रघुनन्दनरूपधृक्।
रमणीयं च तव रूपं श्रद्धया भजाम्यहम्॥
[Verse 17]
सर्वशत्रुनिवृत्त्यर्थं सङ्गोपगम्य हरिसत्तमः।
दिनकरशुभस्वरूपः शरण्यः सर्वत्र भवेत्॥
[Verse 18]
वन्दे विश्वनाथविग्रहं विविधान् दानफलदः।
शान्तिदः सुखदः पन्थान् दधत् भक्तानां मनोहरः॥
[Verse 19]
कौसल्यासुतानुग्रहेण करुणावत्सलविक्रमः।
न्यस्तकण्ठे भवसागरं विजये त्वयि हरे॥
[Verse 20]
करुणामयी त्वदीया नमोऽस्तु जगदीश देह।
भक्तमोक्षदायकं त्वम् इदम् अबलं प्रशान्तये॥
इति जगन्नाथ-आरत्या: