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Jagannath Aarti | जय जगन्नाथ जगदाधार नमोऽस्तु ते | Powerful Sanskrit Aarti with 20 Verses

Bhakti Song by AI

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Jagannath Aarti | जय जगन्नाथ जगदाधार नमोऽस्तु ते | Powerful Sanskrit Aarti with 20 Verses

163 просмотра · 11 мес. назад
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Lyrics: [Chorus] जय जगन्नाथ जगदाधार नमोऽस्तु ते। विष्णोः रूपाय करुणानिधये नमः॥ [Verse 1] वृहन्नयननयनैर्भूयो भूयोऽभिगृह्णीषे। दत्तदृशे दारिद्रदुःखहार करुणावत्सले॥ [Verse 2] निलाद्रिनिवासनाथ रथयात्रारुचिराङ्घ्रे। लोकसौख्यप्रदायक नमोऽस्तु मन्मथे हरि॥ [Verse 3] गोपवर्धनवन्द्यं गोविन्दं रसमान्वितम्। नित्यमरविन्दमुखं भजेम परमेश्वरम्॥ [Verse 4] बलभद्रसहितांभोज सुभद्राप्रीतिमयो यः। त्रिकूटस्थो जगन्नाथः सर्वभूतहितकरः॥ [Verse 5] नित्यलीलासम्पन्नो रासरचितविभूषितः। व्रजनन्दनवपुषा वत्सल्येन महोहति॥ [Verse 6] दारुशिल्पविक्षेपेण दिव्यं रूपं समुत्पत्। नरान्कारुण्यदीप्तान् हृदयान् विनि-शोभयन्॥ [Verse 7] मोहविनाशकं शरणं मुमुक्षुसर्वलोकहितम्। जगन्मित्रं जगन्नाथं पश्यन्ति सर्वे हृदयतः॥ [Verse 8] रथेन्द्रियसमायुक्तो रथानुगो जनार्दनः। हर्षेण हृदि गृह्णीयात् भक्तो‌र्नूनमनुत्तमः॥ [Verse 9] निस्वार्थं ददाति भक्षणं दानं च साधुभक्ता। सर्वक्लेशविनाशकं चरणौ सदा नमाम्यहम्॥ [Verse 10] सागरतीरे स्थिता तीर्थनागे नीलवस्त्रधा। निलाद्र्यन्तर्गतः श्रीः पालय दूरस्थानिकान्॥ [Verse 11] त्रिलोकेशो निरीहः प्रणवविभूषितः। भवसागरनायकः भक्तोपदेशप्रदः सदैव॥ [Verse 12] विक्षिप्तनयनसौम्यं हिरण्यश्लोकभूषणम्। वश्यंकरं नटराजं नित्यं संसृजति भक्तान्॥ [Verse 13] कण्ठे मृदुहासान्नं पितृवत्सलमूर्तये। इदं जगत्पितुर्भवति सदा भक्तानुग्रहः प्रभुः॥ [Verse 14] रुत्सर्गे रथसमागमे रोदसि जननायक। प्रीत्यर्थं पुण्यदानं करोति त्वां सदा वत्सलम्॥ [Verse 15] दोषाक्षमक्षय्यस्ते दैवकल्याणोपदर्शकः। यः समरभजन्त्वाम् तं सर्वकाशेऽपि विजहाति॥ [Verse 16] गोपीनन्दनगुणैः सह रघुनन्दनरूपधृक्। रमणीयं च तव रूपं श्रद्धया भजाम्यहम्॥ [Verse 17] सर्वशत्रुनिवृत्त्यर्थं सङ्गोपगम्य हरिसत्तमः। दिनकरशुभस्वरूपः शरण्यः सर्वत्र भवेत्॥ [Verse 18] वन्दे विश्वनाथविग्रहं विविधान् दानफलदः। शान्तिदः सुखदः पन्थान् दधत् भक्तानां मनोहरः॥ [Verse 19] कौसल्यासुतानुग्रहेण करुणावत्सलविक्रमः। न्यस्तकण्ठे भवसागरं विजये त्वयि हरे॥ [Verse 20] करुणामयी त्वदीया नमोऽस्तु जगदीश देह। भक्तमोक्षदायकं त्वम् इदम् अबलं प्रशान्तये॥ इति जगन्नाथ-आरत्या: