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गुरु सियाग सिद्ध योग ध्यान 30 minutes सर्द और बर्फीले और ठंडे इलाकों के लिए

my spiritual journey with shree siyag sidh yoga

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गुरु सियाग सिद्ध योग ध्यान 30 minutes सर्द और बर्फीले और ठंडे इलाकों के लिए

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ध्यान की विधि: सर्वप्रथम आरामदायक स्थिति में किसी भी दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाएँ. यदि आप बैठ पाने में असमर्थ हैं तो आप ये ध्यान लेटकर भी कर सकते हैं. इसके बाद समर्थ सदगुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग और बाबा श्री गंगाईनाथ के चित्र को कुछ देर तक खुली आँखों से देखते हुए अपनी समस्त समस्याओं के समाधान एवं आपको 15 मिनट तक ध्यान में बिठाने के लिए अंतर्मन से करूण प्रार्थना करें। अब आँखे बंद करके गुरुदेव के चित्र को आज्ञाचक्र पर (जहाँ तिलक या बिंदी लगाते हैं) देखने की कल्पना कीजिये। और फिर मन ही मन (बिना होंठ-जीभ हिलाये) गुरुदेव द्वारा दिए गए 'संजीवनी मन्त्र' का लगातार मानसिक जाप आरम्भ कर दीजिये। ध्यान के दौरान यदि किसी भी यौगिक क्रिया जैसे कि आसन, बन्ध, मुद्रा, प्राणायाम, कम्पन अपने आप होने लगे तो घबराएँ नहीं, और न ही इन्हें रोकने का प्रयास करें। ���े सभी योगिक क्रियाएं जागृत मातृशक्ति कुण्डलिनी स्वयं अपने नियंत्रण में आपके त्रिविध ताप शांत करने के लिए करवाती है। ध्यान की अवस्था में दिव्य प्रकाश, दिव्य गन्ध, दिव्य रस, दिव्य ध्वनि (नाद) तथा अनिश्चित काल का भूत, भविष्य दिखाई दे सकता है। ये सभी दिव्य अनुभूतियाँ भी आपके भीतर जागृत कुण्डलिनी द्वारा ही अनुभव करवाई जाती हैं। ध्यान की अवधि पूर्ण होते ही आप सामान्य अवस्था में लौट आयेंगे। ध्यान दिन में केवल दो बार ही करें, इससे अधिक करने के लिए हमारा भौतिक शरीर समर्थ नहीं होता है। ध्यान ठोस आहार लेने के बाद न करें, ऐसा करने पर या तो ध्यान लगेगा नहीं, और लगेगा भी तो उल्टी हो सकती है. इस लिहाज़ से नियमित सुबह-शाम खाली पेट ध्यान करना ही बेहतर रहेगा। ���ंजीवनी मन्त्र का ‘मानस जाप’ आप जितनी अधिक बार करेंगे, उतना ही उत्तम रहेगा. नहीं तो दिन में कम से कम छ: सात बार कुछ मिनट के लिए जरूर जप लें। गुरु सियाग योग मानव मात्र के लिए है और इसे सभी जाति, धर्म, समुदाय, वर्ग, आयु के लोग कर सकते हैं। Visit www.gurusiyagyoga.org or write to gssyworld@gmail.com for more details. गुरु सियाग योग क्या है? (    • Видео   ) कुण्डलिनी क्या है ? कुण्डलिनी शक्ति हर इंसान में जन्म से ही विद्यमान एक दिव्य ऊर्जा है जो हमारे मूलाधार चक्र में साढ़े तीन आंटे लगाकर (कुण्डलित/spiral) सुषुप्त अवस्था में रहती है। किसी भी समर्थ सद्गुरुदेव द्वारा दिए गए दिव्य मन्त्र के मानसिक जाप और ध्यान करने से यह जागृत होकर ऊपर की ओर उठती (ऊर्ध्वगमन करती) है और छः चक्रों को भेदन करते हुई सहस्रा�� में परम सत्ता लय हो जाती है। इससे व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति जीवित रहते हुए ही हो जाती है। सहस्रार तक पहुँचने की प्रक्रिया में कुण्डलिनी शक्ति साधक को अपने अधीन स्वत: योग (automatic Yoga) करवाती हुई चलती है, क्योंकि समाधि की अवस्था तक पहुँचने के लिए शरीर का निरोगी होना अनिवार्य है। स्वतः संचालित योग आज भी वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है! गुरुदेव की दिव्य वाणी : "हर युग में मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य को ध्यान में रखकर आराधना की विधि तय होती है। कलियुग में केवल हरि नाम का जप ही सारे कष्टों से छुटकारा देता है।" "यह राधा और कृष्ण का मंत्र है इसमें दोनों तत्त्व शामिल हैं। राधा तत्त्व सांसारिक सुख देगा व कृष्ण तत्त्व मोक्ष।" "इस शरीर रूपी सुंदर ग्रंथ क�� पढ़ना चाहते हो तो नाम ही जपो।" "नाम जप चाबी है, इसका तेल की धार की तरह हर समय (उठते, बैठते, चलते, फिरते) Round-The-Clock सघन जाप करो।" "आपको सिर्फ नाम जप व ध्यान करना है, आगे का कार्य गुरु का है।" "विश्वशांति के लिए सभी बहिर्मुखी बौद्धिक प्रयास असफल हो चुके हैं, क्योंकि शांति अंदर से आती है; शांति का संबंध दिल से है। अतः अंतर्मुखी आराधना द्वारा उस परमसत्ता से जुड़े बिना, शांति असम्भव है।" -----------------