सभी कार्य सिद्ध करने के लिए माँ दुर्गा का सप्त शलोकी पाठ
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सभी कार्य सिद्ध करने के लिए माँ दुर्गा का सप्त शलोकी पाठ
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These seven sholkas are full of Meditation of Maa Durga. These sholkas can be remembered by listening repeatedly. Then these shlokas can be included in our daily prayer for Getting the immense blessing of Maa Durga. In Durga Saptshati this is regarded as "कार्य सिद्धीयर्थम उपायम " ये पाठ सुप्रसिद्ध गायक अनुराधा पोढ़वाल जी के पुराने केसट से, केवल भक्ति एवम प्रचार के हेतु लिया गया है. इसके लिए हम उनके आभारी हैं. शलोकों का अर्थ इस प्रकार है -
।। ॐ ओंकार स्वरूपाय श्री गणेशाय नमः ।।
गणपती वंदना –
सजयती सिंदूर वदनों देवो, यत पाद पंकज स्मरणं ।
वासर मणि इव तमसाम राशिम, नाशयति विघनानां ।।
अर्थ – उन, सिंदूर के समान मुख की आभा वाले, गणपती भगवान की जय हो, जिनके चरन कमलों के स्मरण से समस्त विघ्नों का एसे नाश हो जाता है , जेसे दिनमणि अंधकार का नाश कर देती है ।
(1) ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।
अर्थ – वह देवी भगवती महामाया, ज्ञानियोंके भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर, मोह में दाल देती हैं।
(2) दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणी का त्वदन्या, सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।।
अर्थ – हे माँ दुर्गे ! आप अपने स्मरण करने वाले सभी प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा स्मरण करने पर उन्हें कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दरिद्रता, दुःख व भय हरण करने वाली माँ, आपके सिवा दूसरा कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो।
(3) सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयंबके गौरि नारायणि नमोस्तु ते।।
अर्थ – हे समस्त मंगलों का भी मंगल करने वाली माँ ! हे शिवे ! हे समस्त कामनाओ को पूर्ण करने वाली ! हे शरणागतवत्सला ! हे त्रयंबके ! हे गौरि ! हे नारायणि ! आप को प्रणाम है।
(4) शरणागतदीनार्तपरित्राणपराणये।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते।।
अर्थ – शरणागत हुए , दीन एवम दुखी, लोगों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबका कष्ट व पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवि! आप को नमस्कार है।
(5) सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते।।
अर्थ – हे सर्वस्वरूपे ! हे सर्वेश्वरी ! हे समस्त शक्ति सम्पन्न ! हे देवि ! हे दुर्गे ! सभी भयों से हमारी रक्षा करो, आप को नमस्कार है।
(6) रोगानशेषानपहंसि तुष्टा,
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां,
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ।।
अर्थ – हे माँ, आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और नाराज होने पर सभी अभीष्ट कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपात्ति तो आती ही नहीं, अपितु आपकी शरण में आए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं।
(7 ) सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।
अर्थ – हे सम्पूर्ण त्रिलोक की अधीश्वरी ! आप हमारी सभी बाधाओ का प्रशमन करती रहो तथा इसी प्रकार हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
।।इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्ण।।