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श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 4 | दिवस 8

“Cheto Darpan Marjanam – 🙏@SNGM Banglore

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श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 4 | दिवस 8

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🌸 श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 4 (Divas 8) 🌸 हरे कृष्ण 🙏 --- मंत्र 4 अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥ अनुवाद: अपने धाम में रहते हुए भी भगवान मन से भी अधिक वेगवान हैं और उन समस्त दौड़ने वालों को पीछे रख सकते हैं। शक्तिशाली देवता भी उन तक नहीं पहुँच पाते। एक स्थान पर रहते हुए भी वह वायु तथा वर्षा की पूर्ति करने वाले देवताओं को वश में रखते हैं। वह श्रेष्ठों में सबसे आगे हैं। --- *तात्पर्य के मुख्य बिंदु - *1. भगवान को कैसे जाना जा सकता है? बड़े से बड़े दार्शनिक द्वारा भी मानसिक चिंतन द्वारा परमेश्वर को नहीं जाना जा सकता। केवल भक्तों की कृपा से ही भगवान को जाना जा सकता है। 2. भगवान का धाम और उनकी शक्तियाँ संहिता में वर्णन है कि परम भगवान का दिव्य धाम गोलोक है, जहाँ वह नित्य निवास करते हैं। अपने धाम में रहते हुए भी वह अपनी विभिन्न शक्तियों द्वारा सर्वत्र खेलते हैं। भगवान की शक्तियाँ तो अनगिनत हैं, पर तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं - 1. अंतरंगा शक्ति - आध्यात्मिक शक्ति 2. तटस्था शक्ति - जीव शक्ति 3. बहिरंगा शक्ति - भौतिक शक्ति भगवान की विभिन्न शक्तियाँ सर्वत्र विद्यमान हैं। भगवान की शक्ति के प्रत्येक अंश में साक्षात् भगवान के ही समान लक्षण होते हैं। अंश कभी भी पूर्ण के समकक्ष नहीं होता। 3. श्री ईशोपनिषद की चेतावनी मूर्ख लोग भौतिक प्रकृति से मोहित होकर और अज्ञानी बनकर भगवान के अनंत स्वरूप और दिव्य शक्ति के विषय में अटकलें लगाते हैं। श्री ईशोपनिषद मानसिक चिंतन द्वारा भगवान की पहचान साबित करने के प्रयासों के प्रति चेतावनी देता है। 4. जीव की स्थिति भगवान के अंश होते हुए भी अगर जीव रूपी अंश भगवान की इच्छा द्वारा निर्देशित अपने कामों को भूल जाता है, तो उसे माया में स्थित समझा जाता है। 5. आज की सीख श्री ईशोपनिषद प्रारंभ से ही सचेत करता है कि भगवान द्वारा हमारे लिए जो कार्य नियत है, उसी को करें। सारी शक्ति भगवान से ही प्राप्त होती है, इसलिए भगवान की शक्ति का उपयोग भगवान की इच्छा से ही करना चाहिए। ये सभी बातें भगवान के द्वारा भगवद् गीता में कही गई हैं, जो समस्त उपनिषदों का सार है। हरे कृष्ण 🙏