अजहुँ आपने राम | प्रभु श्रीराम से तुलसीदास जी की विनय | Vinay Patrika Pad 193
Pranav Geet
0:00 / 0:00
अजहुँ आपने राम | प्रभु श्रीराम से तुलसीदास जी की विनय | Vinay Patrika Pad 193
132 просмотра · 7 дней назад
Pranav Geet
4,4 тыс. подписчиков
132 просмотра · 7 дней назад
🎤 Experience the Bhakti Live!
🪔 Invite Pranav Geet
Vinay Patrika Live Bhajan & Kirtan
🌼 Event Theme:
“Vinay Patrika: ek Prem Nivedan”
An evening of devotion, compassion & surrender,
jahan Vinay Patrika ke bhav-poorn bhajans ke saath
simple Hindi bhajans bhi gaye jaate hain,
jo har age group aur har bhakt ke liye easy aur soulful hote hain.
🎶 Music that is not just for listening,
but for singing together, feeling together, and connecting with Prabhu.
📧 Email: pranavgeet17@gmail.com
📱 Contact: +91 9875123238
Vinay Patrika bhajans + simple Hindi bhajans
— sabhi ke liye, sabke saath.
सदगुरुदेव भगवान श्री राजेन्द्र दास जी महाराज की कृपा और आज्ञा से विनय पत्रिका का यह दिव्य कार्य प्रारम्भ हुआ है और आगे भी होता रहेगा। हम उन्हें अनंत कोटि दंडवत प्रणाम कर हृदय से अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं। 🙏✨
🙏 Lyrics by: Goswami Tulsidas ji [ Vinay Patrika ]
🎵 Vocals & Music:Rajesh K. Sharma [ PRANAV GEET ]
🙏Video- Bharti Sharma
📿 Bhakti Ras | Spiritual Song | Ram Bhajan
💠 Playlist देखें: [ • 🌸All Vinay Patrika Bhajans | Tulsi Das Ji ... ]
💠 Subscribe करें: Pranav Geet चैनल को और पाएं रोज़ नये भजन
🔔 Don't forget to Like, Share, and Subscribe for more such divine bhajans.
📌 Subscribe for more: / @pranavgeet
📌 Follow us on Instagram:https://www.instagram.com/pranav_geet...
📌 Follow us on Spotify: https://open.spotify.com/artist/6yahQ...
📌 Follow us on fb
facebook.com/Pranav-Geet-104278955538059
📌 Follow us on I tunes
music.apple.com/us/artist/pranav-geet/1635723771
Web Site-
www.anantsangeetacademy.com
lyrics-
अजहुँ आपने राम के करतब समुझत हित होइ ।
कहँ तू, कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ ॥ १ ॥
रीझि निवाज्यो कबहिं तू, कब खीझि दई तोहिं गारि ।
दरपन बदन निहारिकै, सुबिचारि मान हिय हारि ॥ २ ॥
बिगरी जनम अनेककी सुधरत पल लगै न आधु ।
'पाहि कृपानिधि' प्रेमसों कहे को न राम कियो साधु ॥ ३ ॥
बालमीकि - केवट कथा, कपि - भील - भालु - सनमान ।
सुनि सनमुख जो न रामसों, तिहि को उपदेसहि ग्यान ॥४॥
का सेवा सुग्रीवकी, का प्रीति-रीति-निरबाहु ।
जासु बंधु बध्यो ब्याध ज्यों, सो सुनत सोहात न काहु ॥ ५॥
भजन बिभीषनको कहा, फल कहा दियो रघुराज ।
राम गरीब-निवाजके बड़ी बाँह बोलकी लाज ॥ ६ ॥
जपहि नाम रघुनाथको, चरचा दूसरी न चालु ।
सुमुख, सुखद, साहिब, सुधी, समरथ, कृपालु, नतपालु ॥ ७ ॥
सजल नयन, गदगद गिरा, गहबर मन, पुलक सरीर।
गावत गुनगन रामके केहिकी न मिटी भव-भीर ॥ ८॥
प्रभु कृतग्य सरबग्य हैं, परिहरु पाछिली गलानि ।
तुलसी तोसों रामसों कछु नई न जान-पहिचानि॥९॥
भावार्थ
अब भी यदि तू अपनी (नीच करतूतों को) और श्रीरामजी के (दया से पूर्ण) करतबों को समझ ले तो तेरा कल्याण हो सकता है; कहाँ तू (राम विमुख, विषयों में लगा हुआ जीव) और कहाँ (अहैतु को दया के समुद्र) कोशलपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! तुझे सब लोग क्या कहते हैं? (कि यह राम का भक्त है। भक्त और भगवान् में कोई भेद नहीं होता। ऐसा कहलाना क्या तेरी करतूतों का फल है ?) ॥ १ ॥
अरे, जरा (विवेकरूपी) दर्पणमें (अपने मनरूपी) मुखको तो देख कि कब तो श्रीरामजी ने प्रसन्न होकर तुझपर कृपा की है और कब गुस्सेमें आकर तुझे गालियाँ दी है ? (विचार ने से तुझे यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि श्रीरामने तो सदा कृपा ही की है, जो कुछ दोष है, सो तेरा ही है । भगवान् गुस्से होकर गालियाँ देने लगें तो जीवका निस्तार ही कैसे हो ?) फिर (अपनी
करतूतों के लिये) अपनी हार मान (न तो यह समझ कि मेरी करनीसे मैं भक्त कहलाया हूँ और न उनपर दोषारोपण ही कर कि भक्त होनेपर भी वे मेरा उद्धार क्यों नहीं करते ?) ॥ २ ॥
अरे, (उनको उद्धार करते देर ही क्या लगती है) अनेक जन्मों की बिगड़ी हुई दशा सुधारने में उन्हें आधा पल भी नहीं लगता। 'हे कृपानिधान! मेरी रक्षा कीजिये '–प्रेमसे इतना कहते ही ऐसा कौन पापी है जिसको श्रीरामचन्द्रजीने (सच्चा) साधु नहीं बना दिया ? ॥ ३ ॥
वाल्मीकि और गुह निषादकी कथा तथा सुग्रीव, हनुमान्, शबरी, रीछ जाम्बवान् आदिके आदर-सत्कारकी बात सुनकर भी जो श्रीरामजीके शरण नहीं हुआ, उस (मूर्ख) - को कौन ज्ञानका उपदेश कर सकता है ? ॥ ४ ॥
सुग्रीवने कौन- सी सेवा की, और कौन-सी प्रीतिकी रीति निबाही थी ? (राज्य पाकर वह तो श्रीरामजीके कार्यको भूल गया!) पर उसके भी भाई बालिको (अपने ऊपर कलंक लेकर भी) व्याधकी नाईं मार डाला। इस प्रकार मारनेकी बात सुनकर
(भक्तोंके अतिरिक्त और किसीको भी वह अच्छी नहीं लगती ॥ ५ ॥
विभीषण ने कौन-सा भजन किया था ? किन्तु रघुनाथजी ने उसे, उसके बदले में क्या फल दिया (लंकाका महान् साम्राज्य और अपना अचल प्रेम) ।) असल में गरीब निवाज श्रीरामचन्द्रजी को (शरणागत के) रक्षा करने के वचन की बड़ी
लाज है। (शरण आये हुए के पिछले कर्मों की ओर वे देखते ही नहीं) ॥ ६ ॥
इसलिये तू रघुनाथजी का ही नाम जपा कर, दूसरी चर्चा ही न चलाया कर,क्योंकि सुन्दर, सुख देने वाले, बुद्धिमान्, समर्थ, कृपासागर और शरणागत की रक्षा करने वाले स्वामी एक वही हैं ॥ ७ ॥
ऐसा कौन है जिसने आँखोंमें आँसू भरकर, गद्गद वाणीसे, प्रेमपूर्ण चित्तसे
तथा पुलकित होकर श्रीरामचन्द्रजीकी गुणावलिका गान किया हो, और उसका सांसारिक कष्ट (जन्म-मरण) नहीं छूट गया हो ? ॥ ८ ॥
पश्चात्ताप करना छोड़ दें। प्रभु रामचन्द्रजी उपकार मानने वाले और सभी बाहर-भीतर की, आगे-पीछे की बातों को जानने वाले हैं (उनसे तेरी कोई करनी छिपी नहीं है)। तुलसीदास ! रामजी से तेरी कुछ नयी जान-पहचान नहीं है। (उन पर दृढ़ भरोसा रख) ॥ ९॥