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“हे भगवान! आप ही चर और अचर समस्त जगत के पिता, परम पूजनीय एवं सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं” 2/10/2026

Dr Chetna Jha / Chitrangi D D

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“हे भगवान! आप ही चर और अचर समस्त जगत के पिता, परम पूजनीय एवं सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं” 2/10/2026

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Dr Chetna Jha / Chitrangi D D
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भगवद्गीता के अध्याय 11 के श्लोक 43 में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की सर्वोच्च स्थिति को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि चर और अचर—समस्त जगत के आप ही पिता हैं। आप ही परम पूजनीय हैं और आप ही सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। इस श्लोक में अर्जुन भगवान की सर्वोच्चता, सर्वजनक स्वरूप और गुरु-तत्त्व को समझाते हैं। भगवान केवल इस भौतिक जगत के कारण नहीं हैं, बल्कि समस्त जीवों के परम पिता और समस्त ज्ञान के मूल स्रोत हैं। इस श्लोक के माध्यम से हम समझेंगे: चर और अचर का क्या अर्थ है? भगवान को समस्त जगत का जनक क्यों कहा गया है? भगवान को आध्यात्मिक गुरु क्यों कहा गया है? भगवान की पूजा और गुरु की शरण का वास्तविक संबंध क्या है? अर्जुन भगवान से क्षमा और कृपा की प्रार्थना क्यों कर रहे हैं? इस श्लोक का हमारे भक्ति-जीवन और साधना में क्या महत्व है?