बीज को कौन जानता था (@diaryofstudents) (@tseries) #song #video #motivationalsong
Diary of students
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बीज को कौन जानता था (@diaryofstudents) (@tseries) #song #video #motivationalsong
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एक मुट्ठी मिट्टी के भीतर,
एक नन्हा संसार था।
न कोई नाम, न पहचान,
न कल का कोई समाचार था।
आकाश को उसकी ख़बर न थी,
धरती भी मौन पड़ी थी।
पर उस छोटे-से बीज के भीतर,
एक नई सृष्टि खड़ी थी।
न शाखाओं का कोई आकार,
न फूलों का कोई रंग,
न पत्तों की कोई सरसराहट,
न कोयल का मधुर प्रसंग।
फिर भी उसके भीतर पलता
एक अनदेखा विस्तार,
एक नन्हे-से जीवन में
छिपा था पूरा संसार।
वह अपनी शक्ति से अनजान था,
पर उसमें जीवन शेष था।
जिसे जग ने तुच्छ समझा,
उसमें भी भविष्य विशेष था।
हर शुरुआत का शोर नहीं होता,
हर सत्य का प्रमाण नहीं।
जो आज दिखाई नहीं देता,
उसका कल असंभव नहीं।
बीज को कौन जानता था?
किसने उसका मान किया?
जिसे समय ने ढक रखा था,
उसने हरापन दान किया।
वह मिट्टी में दबा हुआ था,
पर उसका अस्तित्व मिटा नहीं।
वह आकार में छोटा था,
संभावनाओं में छोटा नहीं।
बीज को कौन जानता था?
किसने उसका अनुमान किया?
एक नन्हे-से जीवन ने
धरती को हरा-भरा किया।
कभी धूप ने राह रोकी,
कभी वर्षा ने उसे भिगोया।
कभी कठोर हुई धरती,
कभी समय ने धैर्य संजोया।
न कोई ताली, न प्रशंसा,
न कोई देखने आया।
फिर भी उसके भीतर जीवन ने
अपना दीप जलाया।
एक दिन मिट्टी चीरकर
नन्हा अंकुर बाहर आया।
जिसे अँधेरा घेरे था,
उसने सूरज को अपनाया।
न कोई घोषणा हुई,
न कोई उत्सव मनाया गया।
बस एक हरी-सी रेखा से
धरती का रंग बदल गया।
जो जड़ें अँधेरे में बढ़ती हैं,
वे व्यर्थ नहीं जातीं।
जो ऋतुएँ धैर्य से सहता है,
उसकी शाखाएँ फल लाती हैं।
बीज को कौन जानता था?
किसने उसका मान किया?
जिसे समय ने ढक रखा था,
उसने हरापन दान किया।
वह मिट्टी में दबा हुआ था,
पर उसका अस्तित्व मिटा नहीं।
वह आकार में छोटा था,
संभावनाओं में छोटा नहीं।
बीज को कौन जानता था?
किसने उसका अनुमान किया?
एक नन्हे-से जीवन ने
धरती को हरा-भरा किया।
मनुष्य, तू भी याद रख,
हर ऋतु एक-सी नहीं होती।
हर ठहरी हुई राह पर
प्रगति दिखाई नहीं होती।
हर दिन फल की चाह न कर,
अपनी जड़ों को सींच।
दूसरों की ऊँचाई छोड़,
अपने भीतर की गहराई खींच।
वृक्ष वही जो धूप सहकर
दूसरों को छाया दे,
और फल पकने पर अपनी डाल
विनम्रता से झुका दे।
नन्हे कदमों से ही
लंबे सफ़र बनते हैं।
मौन साधना के भीतर
बड़े परिवर्तन पलते हैं।
जो आज तुम्हें न दिखता है,
वह कल साकार हो सकता है।
एक छोटा-सा बीज भी
एक विशाल वन बन सकता है।
बीज को कौन जानता था?
आज वही वृक्ष बन गया।
जिसे किसी ने देखा न था,
वह सबकी छाँव बन गया।
वह मिट्टी में दबा हुआ था,
पर उसका अस्तित्व मिटा नहीं।
वह आकार में छोटा था,
संभावनाओं में छोटा नहीं।
बीज को कौन जानता था?
अब यह जग पहचान गया।
एक नन्हे-से जीवन ने
धरती को हरा-भरा किया।
इसलिए किसी के आज से
उसके कल को मत आँकना।
जो अभी अंकुरित नहीं हुआ,
उसे निर्जीव मत मानना।
हर वृक्ष कभी बीज था,
हर सागर कभी बूँद।
हर उजाले से पहले
रात का होता है एक रूप।
बीज को कौन जानता था?
पर बीज जानता था...
उसे अभी उगना था।