"रत्नकरण्ड श्रावकाचार"- समंतभद्राचार्य कृत- व्या.-35 प्रो.अनेकांत जैन, अहिंसास्थल, नईदिल्ली-29.10.26
Sudhesh Jain
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"रत्नकरण्ड श्रावकाचार"- समंतभद्राचार्य कृत- व्या.-35 प्रो.अनेकांत जैन, अहिंसास्थल, नईदिल्ली-29.10.26
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आज-आचार्य समन्तभद्र स्वामी द्वारा रचित 'रत्नकरण्ड श्रावकाचार' के प्रथम अधिकार (सम्यग्दर्शन अधिकार) का 41वां श्लोक सम्यग्दर्शन और जिनभक्ति के महात्म्य (फल) को दर्शाता है। इस श्लोक में बताया गया है कि एक सम्यग्दृष्टि जीव किस क्रम से संसार के सर्वोच्च वैभवों को भोगकर अंत में मोक्ष (शिवपद) को प्राप्त करता है।
श्लोक-
देवेन्द्रचक्रमहिमानममेयमानं, राजेन्द्रचक्रमवनीन्द्रशिरोर्चनीयम् ।
धर्मेन्द्रचक्रमधरीकृतसर्वलोकं, लब्ध्वा शिवं च जिनभक्तिरुपैति भव्यः ॥41॥
जिनेन्द्र परमात्मा के स्वरूप में सच्ची भक्ति और अनुराग रखने वाला भव्य (सम्यग्दृष्टि) जीव क्रमशः इन पदों को प्राप्त करता है.
1. देवेन्द्रचक्र (स्वर्ग का वैभव): वह जीव सबसे पहले स्वर्गलोक में जाकर अमेय (अमाप/असीमित) ऋद्धि, सुख और वैभव से युक्त देवेन्द्रों के समूह की महिमा को प्राप्त करता है।
2. राजेन्द्रचक्र (चक्रवर्ती का पद): वहाँ से च्युत होकर वह इस पृथ्वी पर आता है और चक्रवर्ती सम्राट बनता है, जिसका चक्ररत्न बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं के मस्तक द्वारा पूजनीय होता है।
3. धर्मेन्द्रचक्र (तीर्थंकर पद): इसके बाद वह समस्त लोक को अपने आत्म-कल्याण के उपदेश से सन्मार्ग पर लगाने वाले भगवान तीर्थंकर का 'धर्मचक्र' (तीर्थंकर प्रकृति का वैभव) प्राप्त करता है, जो पूरे तीन लोक में सर्वोपरि होता है।
4. शिवपद (मोक्ष): अंत में, वह जीव समस्त कर्ममलों (द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म) का नाश करके सदा के लिए अविनाशी, बाधारहित और परम आनंदमयी मोक्ष (शिवपद) को प्राप्त कर लेता है।
यह श्लोक सम्यग्दर्शन अधिकार का अंतिम श्लोक है, जो यह निष्कर्ष देता है कि संसार का सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य (इन्द्र, चक्रवर्ती और तीर्थंकर पद) सम्यक्त्व के प्रभाव से ही सहज प्राप्त हो जाता है। सम्यग्दृष्टि जीव संसार में नहीं भटकता, बल्कि इस क्रमिक उन्नति से गुजरते हुए अंततः पूर्ण स्वाधीनता यानी निर्वाण को प्राप्त करता है।